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प्रकृति संदेश!
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय सोहन लाल द्विवेदी जी की एक बाल कविता शेयर कर रहा हूँ| द्विवेदी जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री सोहन लाल द्विवेदी जी की यह कविता – पर्वत कहता शीश उठाकर,तुम भी ऊँचे बन जाओ।सागर कहता है लहराकर,मन में गहराई…
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ज़ंजीर पहनाई गई!
जुरअत-ए-इंसाँ पे गो तादीब के पहरे रहे,फ़ितरत-ए-इंसाँ को कब ज़ंजीर पहनाई गई| साहिर लुधियानवी
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अब तो ये बातें भी!
उन का ग़म उन का तसव्वुर उन के शिकवे अब कहाँ,अब तो ये बातें भी ऐ दिल हो गईं आई गई| साहिर लुधियानवी
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कैसे कैसे पैकरों की
कैसे कैसे चश्म ओ आरिज़ गर्द-ए-ग़म से बुझ गए,कैसे कैसे पैकरों की शान-ए-ज़ेबाई गई| साहिर लुधियानवी
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अच्छा चलो यूँ ही सही!
हम करें तर्क-ए-वफ़ा अच्छा चलो यूँ ही सही,और अगर तर्क-ए-वफ़ा से भी न रुस्वाई गई| साहिर लुधियानवी
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ऐ ग़म-ए-दुनिया!
ऐ ग़म-ए-दुनिया तुझे क्या इल्म तेरे वास्ते,किन बहानों से तबीअ’त राह पर लाई गई| साहिर लुधियानवी
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बिक गए जब तेरे लब!
बिक गए जब तेरे लब फिर तुझ को क्या शिकवा अगर,ज़िंदगानी बादा ओ साग़र से बहलाई गई| साहिर लुधियानवी