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याद के दीपक!
तुम्हारी याद के दीपक भी अब जलाना क्या,जुदा हुए हैं तो अहद-ए-वफ़ा निभाना क्या| अज़हर इक़बाल
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समुद्र का पानी!
एक बार फिर से आज मैं राष्ट्रकवि के रूप में ख्याति प्राप्त, ओज और शृंगार दोनो प्रकार की अनेक अमर रचनाएं देने वाले कवि स्वर्गीय रामधारी सिंह दिनकर जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ। दिनकर जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रामधारी सिंह दिनकर…
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लकड़ियाँ सुलगने में!
मुस्तक़िल नहीं ‘अमजद’ ये धुआँ मुक़द्दर का,लकड़ियाँ सुलगने में देर कुछ तो लगती है|
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हुस्न के सँवरने में !
हो चमन के फूलों का या किसी परी-वश का,हुस्न के सँवरने में देर कुछ तो लगती है| अमजद इस्लाम अमजद
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भीड़ वक़्त लेती है!
भीड़ वक़्त लेती है रहनुमा परखने में,कारवान बनने में देर कुछ तो लगती है| अमजद इस्लाम अमजद
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सोचने समझने में !
ज़लज़ले की सूरत में इश्क़ वार करता है,सोचने समझने में देर कुछ तो लगती है| अमजद इस्लाम अमजद
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तितलियाँ पकड़ने में!
उन की और फूलों की एक सी रिदाएँ हैं,तितलियाँ पकड़ने में देर कुछ तो लगती है| अमजद इस्लाम अमजद
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रंग यूँ तो होते हैं!
रंग यूँ तो होते हैं बादलों के अंदर ही,पर धनक के बनने में देर कुछ तो लगती है| अमजद इस्लाम अमजद
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ज़िंदगी समझने में!
उम्र-भर की मोहलत तो वक़्त है तआ’रुफ़ का,ज़िंदगी समझने में देर कुछ तो लगती है| अमजद इस्लाम अमजद
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ख़्वाहिशें परिंदों से!
ख़्वाहिशें परिंदों से लाख मिलती-जुलती हों,दोस्त पर निकलने में देर कुछ तो लगती है| अमजद इस्लाम अमजद