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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 29th Jun 2025

    ये जो पेड़ है ये!

    उसे अपने होंटों का लम्स दो कि ये साँस ले,ये जो पेड़ है ये हरा-भरा नहीं हो रहा| अज़हर इक़बाल

  • 29th Jun 2025

    कोई रात आ के!

    कोई रात आ के ठहर गई मिरी ज़ात में,मिरा रौशनी से भी राब्ता नहीं हो रहा| अज़हर इक़बाल

  • 29th Jun 2025

    लो दिन बीता, लो रात गई!

    एक बार फिर से आज मैं हिंदी गीत के शिखर व्यक्तित्व स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ।बच्चन जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी का यह गीत– सूरज ढलकर पच्छिम पहुँचा,डूबा, संध्या आई, छाई,सौ संध्या सी वह संध्या थी,क्यों उठते-उठते…

  • 28th Jun 2025

    तेरी बंदगी से मिरा!

    तू ख़ुदा-ए-हुस्न-ओ-जमाल है तो हुआ करे, तेरी बंदगी से मिरा भला नहीं हो रहा| अज़हर इक़बाल

  • 28th Jun 2025

    कोई आइना हो जो!

    कोई आइना हो जो ख़ुद से मुझ को मिला सके,मिरा अपने-आप से सामना नहीं हो रहा| अज़हर इक़बाल

  • 28th Jun 2025

    रास्ता नहीं हो रहा!

    तिरी सम्त जाने का रास्ता नहीं हो रहा,रह-ए-इश्क़ में कोई मो’जिज़ा* नहीं हो रहा|*करिश्मा अज़हर इक़बाल

  • 28th Jun 2025

    वो चाँद और किसी !

    वो चाँद और किसी आसमाँ पे रौशन है,सियाह रात है उस की गली में जाना क्या| अज़हर इक़बाल

  • 28th Jun 2025

    जुनूँ के वास्ते !

    हर एक सम्त यहाँ वहशतों का मस्कन है,जुनूँ के वास्ते सहरा ओ आशियाना क्या| अज़हर इक़बाल

  • 28th Jun 2025

    फ़रेब खाना क्या!

    खड़े हुए हो मियाँ गुम्बदों के साए में,सदाएँ दे के यहाँ पर फ़रेब खाना क्या| अज़हर इक़बाल

  • 28th Jun 2025

    खुला हुआ है कहीं!

    बसीत होने लगी शहर-ए-जाँ पे तारीकी,खुला हुआ है कहीं पर शराब-ख़ाना क्या| अज़हर इक़बाल

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