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ये जो पेड़ है ये!
उसे अपने होंटों का लम्स दो कि ये साँस ले,ये जो पेड़ है ये हरा-भरा नहीं हो रहा| अज़हर इक़बाल
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लो दिन बीता, लो रात गई!
एक बार फिर से आज मैं हिंदी गीत के शिखर व्यक्तित्व स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ।बच्चन जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी का यह गीत– सूरज ढलकर पच्छिम पहुँचा,डूबा, संध्या आई, छाई,सौ संध्या सी वह संध्या थी,क्यों उठते-उठते…
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तेरी बंदगी से मिरा!
तू ख़ुदा-ए-हुस्न-ओ-जमाल है तो हुआ करे, तेरी बंदगी से मिरा भला नहीं हो रहा| अज़हर इक़बाल
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कोई आइना हो जो!
कोई आइना हो जो ख़ुद से मुझ को मिला सके,मिरा अपने-आप से सामना नहीं हो रहा| अज़हर इक़बाल
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रास्ता नहीं हो रहा!
तिरी सम्त जाने का रास्ता नहीं हो रहा,रह-ए-इश्क़ में कोई मो’जिज़ा* नहीं हो रहा|*करिश्मा अज़हर इक़बाल
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जुनूँ के वास्ते !
हर एक सम्त यहाँ वहशतों का मस्कन है,जुनूँ के वास्ते सहरा ओ आशियाना क्या| अज़हर इक़बाल
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फ़रेब खाना क्या!
खड़े हुए हो मियाँ गुम्बदों के साए में,सदाएँ दे के यहाँ पर फ़रेब खाना क्या| अज़हर इक़बाल