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यह दिया बुझे नहीं!
एक बार फिर से आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय गोपाल सिंह नेपाली जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। नेपाली जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गोपाल सिंह नेपाली जी का यह गीत– घोर अंधकार हो,चल रही बयार हो,आज द्वार–द्वार पर यह दिया बुझे…
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आरज़ू ही रह गई!
आरज़ू ही रह गई ‘मजरूह’ कहते हम कभी,इक ग़ज़ल ऐसी जिसे तस्वीर-ए-जानाना कहें| मजरूह सुल्तानपुरी