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रोते हुए मर जाना है!
मैं वो मेले में भटकता हुआ इक बच्चा हूँ,जिस के माँ बाप को रोते हुए मर जाना है| मुनव्वर राना
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घर की दहलीज़ पे!
घर की दहलीज़ पे रौशन हैं वो बुझती आँखें,मुझ को मत रोक मुझे लौट के घर जाना है| मुनव्वर राना
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मुझ को गहराई में!
मुझ को गहराई में मिट्टी की उतर जाना है,ज़िंदगी बाँध ले सामान-ए-सफ़र जाना है| मुनव्वर राना
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शांत कदम – रवींद्रनाथ ठाकुर
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…
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कुर्सियाँ रह जाएँगी!
क्यों बनाते हो सियासत को तुम अपना हम-सफ़र,सब चले जाएँगे लेकिन कुर्सियाँ रह जाएँगी। आदर्श दुबे