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क़त्ल, चोरी, रहज़नी!
क़त्ल, चोरी, रहज़नी व्यभिचार से दिन थे मुखर,चुप रहा कुछ आज का दिन ख़ास तो अच्छा लगा। राम दरश मिश्र
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लोग यों तो रोज़ ही!
लोग यों तो रोज़ ही आते रहे, आते रहे,आज लेकिन आप आये पास तो अच्छा लगा। राम दरश मिश्र
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बौने बड़े दिखने लगे हैं!
एक बार फिर से आज मैं वरिष्ठ हिंदी कवि श्री सोम ठाकुर जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। सोम जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री सोम ठाकुर जी का यह गीत– नज़रिए हो गये छोटे हमारेमगर बौने बड़े दिखने लगे हैचले इंसानियत की राह…
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सिर किये ऊँचा खड़ी!
आज धरती पर झुका आकाश तो अच्छा लगा,सिर किये ऊँचा खड़ी है घास तो अच्छा लगा। राम दरश मिश्र
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वतन की ख़ाक से!
वतन की ख़ाक से मर कर भी हम को उन्स बाक़ी है,मज़ा दामान-ए-मादर का है इस मिट्टी के दामन में| चकबस्त बृज नारायण
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नई तहज़ीब के झगड़े!
पुरानी काविशें दैर-ओ-हरम की मिटती जाती है,नई तहज़ीब के झगड़े हैं अब शैख़-ओ-बरहमन में| चकबस्त बृज नारायण
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न बतलाई किसी ने!
न बतलाई किसी ने भी हक़ीक़त राज़-ए-हस्ती की,बुतों से जा के सर फोड़ा बहुत दैर-ए-बरहमन में| चकबस्त बृज नारायण
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अँधेरी रात में मोती!
नहीं होता है मुहताज-ए-नुमाइश फ़ैज़ शबनम का,अँधेरी रात में मोती लुटा जाती है गुलशन में| चकबस्त बृज नारायण