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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 8th Aug 2017

    57. जब से गए हैं आप, किसी अजनबी के साथ

    आज एक बार फिर संगीत, विशेष रूप से गज़ल की दुनिया की बात कर लेते हैं। भारतीय उप महाद्वीप में जब गज़ल की बात चलती है तब अधिकतम स्पेस गुलाम अली जी और जगजीत सिंह जी घेर लेते हैं। हालांकि इनसे बहुत पहले बेगम अख्तर जी से गज़ल गायकी लोकप्रिय हुई थी। इसके बाद जिस…

  • 7th Aug 2017

    56. दैर-ओ-हरम में बसने वालो —

    यह जानकर, हर किसी को अच्छा लगता है कि कुछ लोग हमको जानते हैं। लेकिन दुनिया में हर इंसान अलग तरह का है, कितने लोग वास्तव में ऐसे होते हैं, जो किसी व्यक्ति को ठीक से जानते हैं। कुछ लोग हैं, जो हमारे साथ मुहल्ले में रहते हैं, वे हमें इस लिहाज़ से जानते हैं…

  • 6th Aug 2017

    55. मोहसिन मुझे रास आएगी शायद सदा आवारगी।

    संगीत की एक शाम याद आ रही है, कई वर्ष पहले की बात है, दिल्ली के सीरी फोर्ट ऑडिटोरियम में गज़ल गायक- गुलाम अली जी का कार्यक्रम था। मेरे बेटे ने मेरे शौक को देखते हुए मेरे लिए एक टिकट खरीद लिया था, रु.5,000/- का, अब टिकट आ गया था तो जाना ही था। खैर…

  • 4th Aug 2017

    54. जीवों का साहचर्य

    आज गोवा में आए एक महीना हो गया। 3 जुलाई को दोपहर बाद यहाँ पहुंचे थे, गुड़गांव से। बहुत से फर्क होंगे जीवन स्थितियों में, जिनके बारे में समय-समय पर, प्रसंगानुसार चर्चा की जा सकती है। एक फर्क जो आज अचानक महसूस किया, सुबह अपनी बालकनी में टहलते हुए, उस पर चर्चा कर रहा हूँ।…

  • 3rd Aug 2017

    53. पहाड़ों के कदों की खाइयां हैं

    आज दुष्यंत कुमार का एक शेर याद आ रहा है- पहाडों के कदों की खाइयां हैं बुलंदी पर बहुत नीचाइयां हैं।  यह शेर दुष्यंत जी की एक गज़ल से है, जो आपातकाल  के दौरान प्रकाशित हुए उनके संकलन ‘साये में धूप’ में शामिल था और बहुत उसने जनता पर बहुत  प्रभाव छोड़ा था। वैसे तो…

  • 2nd Aug 2017

    52. ज़िंदगी ख्वाब है, था हमें भी पता, पर हमें ज़िंदगी से बहुत प्यार था,

    मेरे एक पुराने मित्र एवं सीनियर श्री कुबेर दत्त का एक गीत मैंने पहले भी शेयर किया है, उसकी कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं- करते हैं खुद से ही, अपनी चर्चाएं सहलाते गुप्प-चुप्प बेदम संज्ञाएं,  बची-खुची खुशफहमी, बाज़ारू लहज़े में,  करते हैं विज्ञापित, कदम दर कदम।  चलिए आज खुद से एक सवाल पूछता हूँ…

  • 31st Jul 2017

    51. कितने दर्पण तोड़े तुमने, लेकिन दृश्य नहीं बदला है

    आज बहादुरी के बारे में थोड़ा विचार करने का मन हो रहा है। जब जेएनयू में,  करदाताओं की खून-पसीने की कमाई के बल पर, सब्सिडी के कारण बहुत सस्ते में हॉस्टलों को बरसों-बरस पढ़ाई अथवा शोध के नाम पर घेरकर पड़े हुए, एक विशेष विचारधारा के विषैले प्राणी हाथ उठाकर देश-विरोधी नारे लगाते हैं, तब…

  • 30th Jul 2017

    50. टांक लिए भ्रम, गीतों के दाम की तरह

    आज असहिष्णुता के बारे में बात करने की इच्छा है। ये असहिष्णुता, उस असहिष्णुता की अवधारणा से कुछ अलग है, जिसको लेकर राजनैतिक दल चुनाव से पहले झण्डा उठाते रहे हैं, और अवार्ड वापसी जैसे उपक्रम होते रहे हैं। मुझे इसमें कतई कोई संदेह नहीं है कि समय के साथ-साथ सहिष्णुता लगातार कम होती गई…

  • 30th Jul 2017

    49. आज मौसम पे तब्सिरा कर लें

    कहते हैं कि मौसम पर बात करना सबसे आसान होता है लेकिन जब मौसम अपनी पर आ जाए तब उसको झेलना सबसे मुश्किल होता है। मैंने भी अपने कुछ गीतों में और  एक गज़ल में मौसम का ज़िक्र किया था, गज़ल के कुछ शेर यहाँ दे रहा हूँ- आज मौसम पे तब्सिरा कर लें, और…

  • 29th Jul 2017

    कोई तो आसपास हो, होश-ओ-हवास में

    जब ब्लॉग लिखना शुरू किया था तो यह विचार किया था कि इसमें दलगत राजनीति के बारे में कुछ नहीं लिखूंगा। वैसी कोई बात लिखनी हो तो कहीं और लिख सकता हूँ। लेकिन जैसे राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता, उसी तरह उसके विमर्श का भी कोई स्थाई तरीका या ठिकाना ज़रूरी नहीं है।…

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