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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 27th Aug 2017

    67. इसलिए प्यार को धर्म बना इसलिए धर्म को प्यार बना

    एक बाबा को सज़ा का ऐलान होने वाला है। अच्छा नहीं लगता कि बाबाओं को इस हालत से गुज़रना पड़े। हमारे देश में परंपरा रही है, राजा-महाराजाओं के ज़माने से, महाराजा दशरथ हों या कोई अन्य प्राचीन सम्राट, वे सभी महात्माओं को आदर देते थे, उनसे मार्गदर्शन लेते थे। मैं समझता हूँ यह परंपरा आज…

  • 25th Aug 2017

    66. न था रक़ीब तो आखिर वो नाम किसका था।

    आज कुछ गज़लें, कवितायें जो याद आ रही हैं, उनके बहाने बात करूंगा। एक मेरे दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी की शनिवारी सभा के साथी थे- राना सहरी,  जो उस समय लिखना शुरू कर रहे थे, बाद में उनकी लिखी कुछ गज़लें जगजीत सिंह जी ने भी गाईं, उनमें से ही एक को याद कर रहा हूँ।…

  • 23rd Aug 2017

    65. चंदू के चाचा, चांद पर

    आज भारत के एक महान कैरेक्टर के बारे में बात कर रहा हूँ, जिन्हें अपनी तारीफ एकदम पसंद नहीं है, लेकिन उनमें गुण इतने हैं कि मेरा मन हो रहा है कि आज उनके बारे में बात कर ही लें। आपने यह दृष्टांत तो सुना ही होगा- ‘चंदू के चाचा ने, चंदू की चाची को,…

  • 21st Aug 2017

    64. आनंदोत्सव

    पिछले तीन दिनों में मैंने श्री श्री रविशंकर जी द्वारा संचालित आनंदोत्सव में भाग लिया। ऐसे शिविर उनकी संस्था- ‘आर्ट ऑफ लिविंग’  द्वारा आयोजित किए जाते रहते हैं, लेकिन जैसा मुझे बताया गया, 30 वर्षों के इन शिविरों के इतिहास में यह तीसरी बार था कि श्री श्री ने सीधे इनमें भागीदारी की और पूरे…

  • 18th Aug 2017

    63. आस्था के नगीने फक़त कांच हैं

    आज सोशल मीडिया के बारे में बात कर लेता हूँ, ये ब्लॉग लिखने का मेरा उद्देश्य यही है कि मैं विभिन्न विषयों पर अपने विचारों को संकलित कर लूं और उसके बाद यदि कभी ऐसा मन बने तो इनमें से कुछ ब्लॉग्स को पुस्तक रूप में प्रकाशित किया जा सकता है। इनमें यदा-कदा अपनी कविताएं…

  • 16th Aug 2017

    62. वह जो नाव डूबनी है मैं उसी को खे रहा हूँ

    जिस प्रकार मौसम पर बात करना बहुत आसान सा काम होता है, टाइम पास वाला काम, अगर आप इसको भी काम कहना चाहें, उसी प्रकार अपने मुहल्ले के बारे में बात करना भी एक अच्छा टाइम-पास होता था, विशेष रूप से महिलाओं के लिए। ये उस समय की बात है, जब मुहल्ले हुआ करते थे,…

  • 15th Aug 2017

    61. अरुण यह मधुमय देश हमारा

    आज याद आ रहा है, शायद 27 वर्ष तक, मैं स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के अवसर पर संदेश तैयार किया करता था, ये संदेश होते थे पहले 5 वर्ष (1983 से 1987) हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की इकाइयों (मुसाबनी और खेतड़ी) और बाद में 22 वर्ष तक एनटीपीसी की कुछ इकाइयों के कर्मचारियों के लिए,…

  • 14th Aug 2017

    60. बच्चों के लिए जो धरती मां, सदियों से सभी कुछ सहती है

    आज मन है कि पिछले ब्लॉग की बात को ही आगे बढ़ाऊं। सभी को समान अवसर मिले, यह कम्युनिस्टों का नारा हो सकता है, लेकिन इस विचार पर उनका एकाधिकार नहीं है। भारतीय विचार इससे कहीं आगे की बात करता है, हम समूचे विश्व को  अपना परिवार मानते हैं। एक विचार जो इससे पनपता है,…

  • 13th Aug 2017

    59. कम्युनिज़्म से आजादी…..

    हम मनाने जा रहे हैं अपना स्वतंत्रता दिवस, अपना स्वाधीनता दिवस, 70 वर्ष पूर्व 15 अगस्त, 1947 को हमारा देश आज़ाद हुआ था, 200 वर्षों की अंग्रेजों की गुलामी से आज़ाद। फिर हमने कहा कि हम अब स्वयं के आधीन हैं, पराधीन नहीं हैं, लेकिन स्वच्छंद भी नहीं हैं। स्वच्छंदता की स्थिति तो अराजकता की…

  • 11th Aug 2017

    58. वहाँ पैदल ही जाना है…..

    आज ऐसे ही, गीतकार शैलेंद्र जी की याद आ गई। मुझे ये बहुत मुश्किल लगता है कि किसी की जन्मतिथि अथवा पुण्यतिथि का इंतज़ार करूं और तब उसको याद करूं। मैंने कहीं पढ़ा था कि शैलेंद्र जी इप्टा से जुड़े थे और वहीं किसी नाटक के मंचन के समय पृथ्वीराज कपूर जी उनसे मिले, बताया कि…

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