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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 17th Oct 2017

    94. वो कौन था, वो कहाँ का था क्या हुआ था उसे!

    आज शहरयार जी की एक गज़ल के बहाने आज के हालात पर चर्चा कर लेते हैं। इससे पहले दुश्यंत जी के एक शेर को एक बार फिर याद कर लेता हूँ- इस शहर में वो कोई बारात हो या वारदात अब किसी भी बात पर खुलती नहीं हैं खिड़कियां। आज की ज़िंदगी इतनी आपाधापी से…

  • 16th Oct 2017

    93. मेरी बेबाक तबीयत का तकाज़ा है कुछ और!

    मुकेश जी का गाया एक प्रायवेट गाना याद आ रहा है- मेरे महबूब, मेरे दोस्त, नहीं ये भी नहीं मेरी बेबाक तबीयत का तकाज़ा है कुछ और। हाँ मैं दीवाना हूँ चाहूँ तो मचल सकता हूँ, खिलवत-ए-हुस्न के कानून बदल सकता हूँ, खार तो खार हैं, अंगारों पे चल सकता हूँ, मेरे महबूब, मेरे दोस्त,…

  • 14th Oct 2017

    92. फिर से मेरा ख्वाब-ए-जवानी थोड़ा सा दोहराए तो!

    अतीत में रहना अक्सर लोगों को अच्छा लगता है, मेरी उम्र के लोगों को और भी ज्यादा। कुछ लोग तो जब मौका मिलता है अतीत में जाकर दुबक जाते हैं, या ऐसा कहते रहते हैं, हमारे समय में तो ऐसा होता है। वैसे मेरा तो यही प्रयास है कि हर समय, मेरा समय रहे, लेकिन…

  • 11th Oct 2017

    91. हाथ खाली हैं मगर व्यापार करता हूँ!

    बचपन में चंदामामा पत्रिका में विक्रम और वैताल की कहानियां पढ़ा करता था, जिनकी शुरुआत इस प्रकार होती थी- ‘विक्रमादित्य ने जिद नहीं छोड़ी’ और फिर अपनी ज़िद के कारण जब वह वैताल को लादकर चलता है, तब वैताल उसे कहानी सुनाता है और बीच में टोकने पर वह फिर वापस उड़कर चला जाता है।…

  • 9th Oct 2017

    90. मेरे नाम से खत लिखती है तुमको मेरी तन्हाई!

    पिछला ब्लॉग लिखने का जब खयाल आया था, तब मन में एक छवि थी, बाद में लिखता गया और वह मूल छवि जिससे लिखने का सोचा था भूल ही गया, तन्हाई का यही तो  मूल भाव है कि लोग अचानक भूल जाते हैं। वह बात अब कर लेता हूँ। कुछ समय पहले प्रसिद्ध अभिनेता विनोद…

  • 8th Oct 2017

    89. हाय क्या लोग मेरा साथ निभाने निकले!

    जीवन के जो अनुभव सिद्ध सिद्धांत हैं, वही अक्सर कविता अथवा शायरी में भी आते हैं, लेकिन ऐसा भी होता है कि कवि-शायर अक्सर खुश-फहमी में, बेखुदी में भी रहते हैं और शायद यही कारण है कि दिल टूटने का ज़िक्र शायरी में आता है या यह कहा जाता है- मुझे तुमसे कुछ भी न…

  • 6th Oct 2017

    88. गोद लिए हुलसी फिरै तुलसी सो सुत होय!

    आज की बात शुरू करते समय मुझे चुनाव के समय का एक प्रसंग याद आ रहा है। अटल बिहारी वाजपेयी जी के विरुद्ध डॉ. कर्ण सिंह चुनाव लड़ रहे थे। दोनों श्रेष्ठ नेता हैं और एक दूसरे का आदर भी करते हैं। एक चुनावी सभा में डॉ. कर्ण सिंह ने कहा कि वाजपेयी जी इस…

  • 2nd Oct 2017

    87. आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं झांकी हिंदुस्तान की

    आज भारत की दो महान विभूतियों की  जयंती है, एक तो जिन्हें हम राष्ट्रपिता के नाम से जानते हैं और दूसरे भारत रत्न लाल बहादुर शास्त्री जी। इन महापुरुषों की जयंती आज देश मना रहा है। राजनीति के क्षेत्र से ऐसे अनेक और लोग हैं जिनको ‘भारत रत्न’ का दर्जा दिया गया, मैं आज एक…

  • 1st Oct 2017

    86. मैं चंद ख्वाब ज़माने में छोड़ आया था!

    आज मुकेश जी की गाई हुई दो प्रायवेट गज़लें शेयर कर रहा हूँ, ऐसी पहचान रही है मुकेश जी की, कि उन्होंने जो कुछ गाया उसको अमर कर दिया। उनके गायन में शास्त्रीयता का अभाव विद्वान लोग बताते हैं। मैं यह मानता हूँ कि मंदिरों में, पूजा में पहले गाया जाता था, उसके बाद गायन…

  • 29th Sep 2017

    85. ये दिल्ली है बाबू!

    दिल्ली में मेरा जन्म हुआ, 30 वर्ष की आयु तक मैं दिल्ली में ही रहा, शुरू की 2-3 नौकरियां भी वहीं कीं और सेवानिवृत्ति के बाद भी लगभग 7 वर्ष तक, दिल्ली के पास गुड़गांव में रहा। इसलिए कह सकता हूँ कि दिल्ली को काफी हद तक जानता हूँ, और मैंने दिल्ली के अपने अनुभव…

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