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23. चांद पागल है अंधेरे में निकल पड़ता है!
जीवन यात्रा का एक और पड़ाव और, एक और पुराना ब्लॉग! मुसाबनी प्रवास के दौरान मेरे 2-3 पड़ौसियों की बात कर लेते हैं, एक पांडे जी थे, बनारस के और सिविल विभाग में काम करते थे, उनके साथ मिलकर मैं खैनी खाया करता था। एक और पांडे जी थे, वो रांची के थे, दाढ़ी रखते…
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162. ठेले पर हिमालय
डॉ. धर्मवीर भारती की रचना का शीर्षक याद आ गया, जो उन्होंने इलाहाबाद में ठेले पर अमरूद का ऊंचा पहाड़ बनाकार बेचने वालों को ध्यान में रखकर लिखा था। दरअसल मैं मुहल्लों को याद कर रहा था, पुराने ज़माने के, जब हमारा बचपन था! सुबह-सुबह मुहल्ले में कुछ आवाजें आनी शुरू हो जाती थीं। कोई…
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161. नए परिंदों को उड़ने में वक़्त तो लगता है!
आज जगजीत सिंह जी की गाई एक बहुत सुंदर गज़ल शेयर कर रहा हूँ, जिसके लेखक हैं- हस्ती जी। वैसे देखा जाए तो यह गज़ल आज की नहीं लगती, दुनिया बड़ी तेजी से बदल रही है, कौन ख़त लिखता है आज की तारीख में! जब तलाक भी एसएमएस पर हो जाते हैं। खैर यहाँ ख़त…
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160. हरापन नहीं टूटेगा
आज स्व. रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर करने का मन हो रहा है, रंजक जी नवगीत आंदोलन के एक महत्वपूर्ण रचनाकार थे। जो रचना शेयर कर रहा हूँ, इसी शीर्षक से उनका एक प्रारंभिक संकलन भी प्रकाशित हुआ था। इस गीत में उन्होंने आशावाद और जुझारूपन की भावनाओं को अभिव्यक्त किया है। प्रस्तुत…
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22. बैरी अंधियारे से कॉपी जंचवानी थी!
जीवन यात्रा का एक और पड़ाव और, एक और पुराना ब्लॉग! हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड का मऊभंडार में कारखाना था, जहाँ मेरा साक्षात्कार एवं चयन हुआ था, बड़े अधिकारी यहाँ बैठते थे। हमारे वरिष्ठ प्रबंधक- राजभाषा श्री गुप्ता जी भी यहाँ बैठते थे, वैसे वो अपना उपनाम ‘गुप्त’ ही लिखते थे और कहते थे कि गुप्ता…
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159. मुझको बना दिया है गुनाहों का देवता!
आजकल नीरव मोदी का नाम बहुत गूंज रहा है और इस पर राजनेता भी खूब गला फाड़ रहे हैं, वे भी जिनके शासन काल में ये और ऐसे अनेक घोटाले हुए। इसे ही कहते है ‘ऑफेंस इज़ द बेस्ट डिफेंस’। खैर मुझे फिलहाल राजनेताओं के बारे में कुछ नहीं कहना है! नीरव मोदी से जुड़े…
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158. चमकते चाँद को टूटा हुआ तारा बना डाला
आज गुलाम अली जी का गाया हुआ एक गीत याद आ रहा है, जिसे आनंद बक्षी जी ने लिखा है और इसका संगीत अनु मलिक जी ने तैयार किया है। यह गीत वैसे ही सुंदर लिखा गया है और गुलाम अली जी की गायकी ने इसको अमर बना दिया है। मूल बात जो इसमें है,…
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21. रेत के घरौंदों में सीप के बसेरे!
जीवन यात्रा का एक पड़ाव और, एक पुराना ब्लॉग! जयपुर में रहते हुए ही मैंने हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की एक वैकेंसी देखी, हिंदी अनुवादक के लिए, यह कार्यपालक श्रेणी का पद था, जबकि आकाशवाणी में, मैं पर्यवेक्षकीय स्तर पर था, हालांकि पदनाम वही था। इसके अलावा वेतन में काफी अंतर था। मैंने आवेदन किया और…
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157. या रब न वो समझे हैं, न समझेंगे मेरी बात!
सामान्यतः मैं अपने ब्लॉग्स में गीतों, गज़लों के माध्यम से अपनी बात कहने की कोशिश करता हूँ। कई बार मन होता है कि किसी सामयिक विषय पर अलग से अपनी बात कहूं। ऐसा मैं कभी-कभी करता भी हूँ, जब ऐसी घटना हो जो सामाजिक विसंगति अथवा उपलब्धि से जुड़ी हो लेकिन जिसे किसी राजनैतिक गतिविधि…
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20. आंचल ही न समाए तो क्या कीजे!
आज फिर से जीवन का एक पुराना पृष्ठ, कुछ पुरानी यादें, एक पुराना ब्लॉग! जयपुर पहुंच गए लेकिन काफी कुछ पीछे छूट गया। मेरी मां, जिनके लिए हमारा वह पुराना मोहल्ला अपने गांव जैसा था, बल्कि मायका भी था क्योंकि उनके भतीजे- वकील साहब वहीं रहते थे। वो दिल्ली नहीं छोड़ पाईं। एक-दो बार हमारे…