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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 27th Nov 2021

    आज क्यों शर्मा रहा हूँ!

    भरम तेरे सितम का खुल चुका है,मैं तुझसे आज क्यों शर्मा रहा हूँ| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 27th Nov 2021

    ले ले अपनी आहट!

    अगर मुमकिन हो ले ले अपनी आहट,ख़बर दो हुस्न को मैं आ रहा हूँ| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 27th Nov 2021

    धोखे खा रहा हूँ!

    यक़ीं ये है हक़ीक़त खुल रही है,गुमाँ ये है कि धोखे खा रहा हूँ| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 27th Nov 2021

    कुछ बहला रहा हूँ!

    तेरे ग़म को भी कुछ बहला रहा हूँ,जहाँ को भी मैं समझा रहा हूँ| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 27th Nov 2021

    बहुत घबरा रहा हूँ

    सितारों से उलझता जा रहा हूँ,शब-ए-फ़ुरक़त बहुत घबरा रहा हूँ| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 27th Nov 2021

    कहीं मस्जिद कहीं मंदिर क्यूँ है!

    आज मैं सुदर्शन फाक़िर जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| फाक़िर साहब ने बहुत अच्छी शायरी की है, उनकी बहुत सी ग़ज़लें प्रसिद्ध गायकों ने गयी हैं, जैसे कुछ शेर मुझे याद या रहे हैं- अगर हम कहें और वो मुस्कुरा दें, हम उनके लिए ज़िंदगानी लुटा दें| ***** ग़म बढे़ आते हैं…

  • 26th Nov 2021

    कोई भी चारा न था!

    याद करके और भी तकलीफ़ होती थी ‘अदीम’,भूल जाने के सिवा अब कोई भी चारा न था| अदीम हाशमी

  • 26th Nov 2021

    शहर धुँधलाया न था!

    ये भी सब वीरानियाँ उस के जुदा होने से थीं,आँख धुँधलाई हुई थी, शहर धुँधलाया न था| अदीम हाशमी

  • 26th Nov 2021

    तू सोया न था!

    आज मिलने की ख़ुशी में सिर्फ़ मैं जागा नहीं,तेरी आँखों से भी लगता है कि तू सोया न था| अदीम हाशमी

  • 26th Nov 2021

    कोई तेरे जैसा न था!

    मैं तेरी सूरत लिए सारे ज़माने में फिरा,सारी दुनिया में मगर, कोई तेरे जैसा न था| अदीम हाशमी

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