Skip to content

SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
    • Activity
    • Members
    • Sample Page
    • Sample Page
    • Sample Page
    • About
    • Contact
  • 20th Apr 2018

    53. पहाड़ों के क़दों की खाइयां हैं !

    आज फिर से, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग- आज दुष्यंत कुमार का एक शेर याद आ रहा है- पहाडों के क़दों की खाइयां हैं बुलंदी पर बहुत नीचाइयां हैं। यह शेर दुष्यंत जी की एक गज़ल से है, जो आपातकाल के दौरान प्रकाशित हुए उनके संकलन ‘साये में धूप’ में शामिल था और…

  • 19th Apr 2018

    52. …. पर हमें ज़िंदगी से बहुत प्यार था !

    आज फिर से पुराने ब्लॉग की बारी है, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग- मेरे एक पुराने मित्र एवं सीनियर श्री कुबेर दत्त का एक गीत मैंने पहले भी शेयर किया है, उसकी कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं- करते हैं खुद से ही, अपनी चर्चाएं सहलाते गुप्प-चुप्प बेदम संज्ञाएं, बची-खुची खुशफहमी, बाज़ारू लहज़े…

  • 18th Apr 2018

    192. परिंदे अब भी पर तौले हुए हैं! #DEFINITELYPTE

    आज जबकि दुनिया इतनी छोटी हो गई है, पहले जितना हम देश के किसी दूसरे शहर में बच्चे के पढ़ने जाने अथवा नौकरी पर जाने के बारे में सोचते थे, उतना अब विदेशों में जाने के बारे में भी नहीं सोचते हैं। आज पूरी दुनिया कितनी छोटी हो गई है, हम लोग और शायद हमसे…

  • 18th Apr 2018

    191 . दुनिया की सैर कर लो!

    #SayYesToTheWorld हम हिंदुस्तानी हैं, अपने देश से प्यार करते हैं। लेकिन आज हम पूरी दुनिया में फैले हुए हैं बहुत पहले से, जब यात्रा के साधन इतने अच्छे नहीं थे, तबसे हमारे बहुत से लोग विदेशों में जाकर बसते रहे हैं, जो एग्रीमेंट के तहत काम के लिए जाते थे और उनको देशी भाषा में…

  • 17th Apr 2018

    51. कितने दर्पण तोड़े तुमने, लेकिन दृश्य नहीं बदला है !

    आज फिर से पुराने ब्लॉग की बारी है, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग- आज बहादुरी के बारे में थोड़ा विचार करने का मन हो रहा है। जब जेएनयू में, करदाताओं की खून-पसीने की कमाई के बल पर, सब्सिडी के कारण बहुत सस्ते में हॉस्टलों को बरसों-बरस पढ़ाई अथवा शोध के नाम पर घेरकर…

  • 16th Apr 2018

    190 . और क्या ज़ुर्म है पता भी नहीं!

    अभी दो दिन पहले ही ज़िंदगी के बारे में एक ब्लॉग पोस्ट लिखी थी किसी बहाने से, आज फिर खयाल आया कि क्या ज़िंदगी के लिए एक ब्लॉग पोस्ट काफी है! वैसे मैंने पहले भी इस शीर्षक को लेकर लिखा है, और जब तक ज़िंदगी जीते रहेंगे, यह विषय तो सार्थक रहेगा ही। मूड के…

  • 15th Apr 2018

    50. टांक लिए भ्रम, गीतों के दाम की तरह !

    लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग- आज असहिष्णुता के बारे में बात करने की इच्छा है। ये असहिष्णुता, उस असहिष्णुता की अवधारणा से कुछ अलग है, जिसको लेकर राजनैतिक दल चुनाव से पहले झण्डा उठाते रहे हैं, और अवार्ड वापसी जैसे उपक्रम होते रहे हैं। मुझे इसमें कतई कोई संदेह नहीं है कि समय…

  • 14th Apr 2018

    189 . ज़िंदगी का कोई इलाज नहीं!

    #IndiSpire आज इंडिस्पायर पर सुझाए गए विषय के आधार पर, आलेख लिखने का प्रयास कर रहा हूँ- #MyPhilosophyOfLife सबसे पहले तो निदा फाज़ली साहब की गज़ल के कुछ शेर याद आ रहे हैं- दुनिया जिसे कहते हैं, जादू का खिलौना है, मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है। ग़म हो कि ख़ुशी…

  • 14th Apr 2018

    49. आज मौसम पे तब्सिरा कर लें !

    लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग- यह ब्लॉग पिछले वर्ष बरसात के मौसम में लिखा था। कहते हैं कि मौसम पर बात करना सबसे आसान होता है लेकिन जब मौसम अपनी पर आ जाए तब उसको झेलना सबसे मुश्किल होता है। मैंने भी अपने कुछ गीतों में और एक गज़ल में मौसम का ज़िक्र…

  • 13th Apr 2018

    188 . संस्मरण के बहाने मगर, याद आने से क्या फायदा!

    मैंने जब ब्लॉग लिखना शुरू किया था, तब शुरू के बहुत सारे ब्लॉग अपने जीवन से जोड़कर लिखे थे, जिसमें बहुत से मित्रों और ऐसे लोगों का ज़िक्र किया था, जिनसे जीवन को दिशा मिली, प्रेरणा मिली। यह बात मैं नौकरी की गतिविधियों से अलग कह रहा हूँ, वैसे नौकरी से जुड़े बहुत से प्रसंग…

←Previous Page
1 … 1,348 1,349 1,350 1,351 1,352 … 1,374
Next Page→

Blog at WordPress.com.

Privacy & Cookies: This site uses cookies. By continuing to use this website, you agree to their use.
To find out more, including how to control cookies, see here: Cookie Policy
  • Subscribe Subscribed
    • SamaySakshi
    • Join 1,143 other subscribers.
    • Already have a WordPress.com account? Log in now.
    • SamaySakshi
    • Subscribe Subscribed
    • Sign up
    • Log in
    • Report this content
    • View site in Reader
    • Manage subscriptions
    • Collapse this bar