-
53. पहाड़ों के क़दों की खाइयां हैं !
आज फिर से, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग- आज दुष्यंत कुमार का एक शेर याद आ रहा है- पहाडों के क़दों की खाइयां हैं बुलंदी पर बहुत नीचाइयां हैं। यह शेर दुष्यंत जी की एक गज़ल से है, जो आपातकाल के दौरान प्रकाशित हुए उनके संकलन ‘साये में धूप’ में शामिल था और…
-
52. …. पर हमें ज़िंदगी से बहुत प्यार था !
आज फिर से पुराने ब्लॉग की बारी है, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग- मेरे एक पुराने मित्र एवं सीनियर श्री कुबेर दत्त का एक गीत मैंने पहले भी शेयर किया है, उसकी कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं- करते हैं खुद से ही, अपनी चर्चाएं सहलाते गुप्प-चुप्प बेदम संज्ञाएं, बची-खुची खुशफहमी, बाज़ारू लहज़े…
-
192. परिंदे अब भी पर तौले हुए हैं! #DEFINITELYPTE
आज जबकि दुनिया इतनी छोटी हो गई है, पहले जितना हम देश के किसी दूसरे शहर में बच्चे के पढ़ने जाने अथवा नौकरी पर जाने के बारे में सोचते थे, उतना अब विदेशों में जाने के बारे में भी नहीं सोचते हैं। आज पूरी दुनिया कितनी छोटी हो गई है, हम लोग और शायद हमसे…
-
191 . दुनिया की सैर कर लो!
#SayYesToTheWorld हम हिंदुस्तानी हैं, अपने देश से प्यार करते हैं। लेकिन आज हम पूरी दुनिया में फैले हुए हैं बहुत पहले से, जब यात्रा के साधन इतने अच्छे नहीं थे, तबसे हमारे बहुत से लोग विदेशों में जाकर बसते रहे हैं, जो एग्रीमेंट के तहत काम के लिए जाते थे और उनको देशी भाषा में…
-
51. कितने दर्पण तोड़े तुमने, लेकिन दृश्य नहीं बदला है !
आज फिर से पुराने ब्लॉग की बारी है, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग- आज बहादुरी के बारे में थोड़ा विचार करने का मन हो रहा है। जब जेएनयू में, करदाताओं की खून-पसीने की कमाई के बल पर, सब्सिडी के कारण बहुत सस्ते में हॉस्टलों को बरसों-बरस पढ़ाई अथवा शोध के नाम पर घेरकर…
-
190 . और क्या ज़ुर्म है पता भी नहीं!
अभी दो दिन पहले ही ज़िंदगी के बारे में एक ब्लॉग पोस्ट लिखी थी किसी बहाने से, आज फिर खयाल आया कि क्या ज़िंदगी के लिए एक ब्लॉग पोस्ट काफी है! वैसे मैंने पहले भी इस शीर्षक को लेकर लिखा है, और जब तक ज़िंदगी जीते रहेंगे, यह विषय तो सार्थक रहेगा ही। मूड के…
-
50. टांक लिए भ्रम, गीतों के दाम की तरह !
लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग- आज असहिष्णुता के बारे में बात करने की इच्छा है। ये असहिष्णुता, उस असहिष्णुता की अवधारणा से कुछ अलग है, जिसको लेकर राजनैतिक दल चुनाव से पहले झण्डा उठाते रहे हैं, और अवार्ड वापसी जैसे उपक्रम होते रहे हैं। मुझे इसमें कतई कोई संदेह नहीं है कि समय…
-
189 . ज़िंदगी का कोई इलाज नहीं!
#IndiSpire आज इंडिस्पायर पर सुझाए गए विषय के आधार पर, आलेख लिखने का प्रयास कर रहा हूँ- #MyPhilosophyOfLife सबसे पहले तो निदा फाज़ली साहब की गज़ल के कुछ शेर याद आ रहे हैं- दुनिया जिसे कहते हैं, जादू का खिलौना है, मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है। ग़म हो कि ख़ुशी…
-
49. आज मौसम पे तब्सिरा कर लें !
लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग- यह ब्लॉग पिछले वर्ष बरसात के मौसम में लिखा था। कहते हैं कि मौसम पर बात करना सबसे आसान होता है लेकिन जब मौसम अपनी पर आ जाए तब उसको झेलना सबसे मुश्किल होता है। मैंने भी अपने कुछ गीतों में और एक गज़ल में मौसम का ज़िक्र…
-
188 . संस्मरण के बहाने मगर, याद आने से क्या फायदा!
मैंने जब ब्लॉग लिखना शुरू किया था, तब शुरू के बहुत सारे ब्लॉग अपने जीवन से जोड़कर लिखे थे, जिसमें बहुत से मित्रों और ऐसे लोगों का ज़िक्र किया था, जिनसे जीवन को दिशा मिली, प्रेरणा मिली। यह बात मैं नौकरी की गतिविधियों से अलग कह रहा हूँ, वैसे नौकरी से जुड़े बहुत से प्रसंग…