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राम-ओ-कृष्ण-ओ!
वेद उपनिषद पुर्ज़े पुर्ज़े गीता क़ुरआँ वरक़ वरक़,राम-ओ-कृष्ण-ओ-गौतम-ओ-यज़्दाँ ज़ख़्म-रसीदा सब के सब| अली सरदार जाफ़री
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इंसाँ इंसाँ बनेगा कब!
वही है वहशत, वही है नफ़रत आख़िर इस का क्या है सबब,इंसाँ इंसाँ बहुत रटा है इंसाँ इंसाँ बनेगा कब| अली सरदार जाफ़री
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फाँसियाँ उगती रहीं!
फाँसियाँ उगती रहीं ज़िंदाँ उभरते ही रहे,चंद दीवाने जुनूँ के ज़मज़मे गाते रहे| अली सरदार जाफ़री
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आरिज़ पे लहराते रहे!
जिस क़दर बढ़ता गया ज़ालिम हवाओं का ख़रोश,उस के काकुल* और भी आरिज़ पे लहराते रहे|*ज़ुल्फ की लट अली सरदार जाफ़री
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रहबरों की भूल थी!
रहबरों की भूल थी या रहबरी का मुद्दआ’,क़ाफ़िलों को मंज़िलों के पास भटकाते रहे| अली सरदार जाफ़री
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शहरयार-ओ-हुक्मराँ!
कारवान-ए-हिम्मत-ए-जम्हूर बढ़ता ही गया,शहरयार-ओ-हुक्मराँ आते रहे जाते रहे| अली सरदार जाफ़री
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आँधियाँ चलती रहें!
आँधियाँ चलती रहें अफ़्लाक थर्राते रहे,अपना परचम हम भी तूफ़ानों में लहराते रहे| अली सरदार जाफ़री
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रवां दवां थी सियासत में रंग भरते हुए!
आज मैं अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से अपने एक पुराने कवि मित्र स्वर्गीय मिलाप चंद राही जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ, आशा है आपको पसंद आएगी – रवां दवां थी सियासत में रंग भरते हुए, लरज़ गई है ज़ुबां दिल की बात करते हुए। https://youtu.be/LFmQ-CJo Myg?si=y8TrRCEWxQubE2es धन्यवाद।
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कौन कहता है कि !
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय बलबीर सिंह रंग जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। रंग जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बलबीर सिंह रंग जी का यह गीत – कौन कहता है कि पीछे जा रहा हूँ मैं?जो गये आगे उन्हीं से…