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एक पुराना दुख
इस शहर में वो कोई बारात हो या वारदात अब किसी भी बात पर खुलती नहीं हैं खिड़कियां । (दुश्यंत कुमार) लेकिन ये ब्लॉग लिखने का उद्देश्य तो खिड़कियों को खोलने का प्रयास करना ही है। एक पुराना अनुभव साझा कर रहा हूँ, उससे पहले ये पंक्तियां याद आ रही हैं- एक पुराने दुख ने…
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आसमान धुनिए के छप्पर सा
आज अपनी ब्लॉगिंग यात्रा की सबसे पहली पोस्ट दुबारा शेयर कर रहा हूँ जो लगभग 8 वर्ष पहले लिखी थी। किसी गुमनाम से एक शहर में पैदा हुए थे हम नहीं है याद पर कोई अशुभ सा ही महीना था,रजाई की जगह ओढ़ी पुआलों की भभक हमनेविरासत में मिला हमको, हमारा ही पसीना था।यह पंक्तियां…