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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 7th Mar 2019

    ये तो कहो कौन हो तुम, कौन हो तुम!

    आज फिर से मुझे अपने प्रिय गायक मुकेश जी का गाया एक गीत याद आ रहा है। जनकवि शैलेंद्र जी का लिखा यह गीत, 1962 में बनी फिल्म- आशिक़ के लिए मुकेश जी ने शंकर जयकिशन जी के संगीत निर्देशन में गाया था। इस फिल्म में राजकपूर एक सड़क छाप नायक बने हैं, जो संभ्रांत…

  • 6th Mar 2019

    अडिग- रवींद्रनाथ ठाकुर

    आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य…

  • 5th Mar 2019

    Our Great India- These Cheap Politicians!

    Again it is my submission based on a weekly prompt, yes I am a bit late in submitting it, this time. The subject is ‘how we can stop terror attacks?’ I am sorry to say that there is not much which a common man can do to stop terror attacks. But yes, everybody needs to…

  • 4th Mar 2019

    44. रोशनी के साथ हंसिए बोलिये!

    आज फिर से प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग- आज गुड़गांव से, गोवा की तरफ रवानगी का ज़िक्र और फिर से कुछ पुरानी यादें ताज़ा करने का अवसर है। संक्रमण काल है, सामान जा चुका, अब अपने जाने की बारी है। ऐसे में भी मौका मिलने पर बात तो की जा सकती है। समय है…

  • 3rd Mar 2019

    गोवा कार्निवाल

    यह कहा जाता है कि जहाँ रहते हैं, वहाँ का गाना भी चाहिए! वैसे भी जहाँ इंसान रहता, वहाँ की विशेषताओं से वह परिचित होता ही है और कभी वहाँ के बारे में बात करने के लिए मज़बूर भी हो जाता है। पिछले डेढ़ वर्ष से पंजिम, गोवा में रह रहा हूँ। कम ही लिखा…

  • 28th Feb 2019

    चंपा का फूल

    आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि  गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य…

  • 27th Feb 2019

    43. रात लगी कहने सो जाओ देखो कोई सपना!

    आज फिर प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग- मैंने अपने शुरू केे ब्लॉग्स में बचपन  से लेकर वर्ष 2010 तक, जबकि मेरे सेवाकाल का समापन एनटीपीसी ऊंचाहार में हुआ, तब तक अपने आसपास घटित घटनाओं को साक्षी भाव से देखने का प्रयास किया, जैसे चचा गालिब ने कहा था- बाज़ार से गुज़रा हूँ, खरीदार नहीं…

  • 26th Feb 2019

    इतना सा मेरापन!

    आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि  गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य…

  • 25th Feb 2019

    Traditions or Best Practices!

    There was a story I read  in my childhood. In that story a person who had gone for pilgrimage, puts the money he had with him, in a copper vessel and places  it in a hole he dug in the ground and then covered it and put some flowers on the elevated mud cover, so…

  • 24th Feb 2019

    Gadgets with a better design!

    I do not feel well versed with the modern gadgets, for example there are many functions in the mobile phone sets, which I am not comfortable in using. I do not find myself in a position to find faults in the gadgets but I am inspired to talk about one gadget or device, which people…

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