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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 12th Jan 2022

    मैं चुप था तो–

    मैं चुप था तो चलती हवा रुक गई,ज़ुबां सब समझते हैं जज़्बात की| बशीर बद्र

  • 12th Jan 2022

    नदी गुनगुनाई ख़यालात की!

    उजालों की परियाँ नहाने लगीं,नदी गुनगुनाई ख़यालात की| बशीर बद्र

  • 12th Jan 2022

    कहाँ रात की!

    कई साल से कुछ ख़बर ही नहीं,कहाँ दिन गुज़ारा कहाँ रात की| बशीर बद्र

  • 12th Jan 2022

    आरज़ू थी मुलाक़ात की!

    न जी भर के देखा न कुछ बात की,बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की| बशीर बद्र

  • 12th Jan 2022

    हँसाते-हँसाते रूलाया गया हूँ !

    स्वर्गीय बलबीर सिंह ‘रंग’ जी हिन्दी साहित्य मंच के एक अनूठे कवि थे, उनकी अभिव्यक्ति शैली अलग तरह की थी, अक्सर एक कवि के रूप में वे अपनी बात करते थे, आज भी मैं ‘आत्माभिव्यक्ति शैली में मैं लिखी गई उनकी एक कविता शेयर कर रहा हूँ| लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय बलबीर सिंह ‘रंग’ जी…

  • 11th Jan 2022

    कभी आ के चुरा ले मुझको!

    मैं खुले दर के किसी घर का हूँ सामां प्यारे,तू दबे पाँव कभी आ के चुरा ले मुझको| क़तील शिफ़ाई

  • 11th Jan 2022

    जूड़े में सजा ले मुझको!

    मैं जो कांटा हूँ तो चल मुझसे बचाकर दामन,मैं हूँ गर फूल तो जूड़े में सजा ले मुझको| क़तील शिफ़ाई

  • 11th Jan 2022

    कर दिया तूने अगर–

    ख़ुद को मैं बांट न डालूं कहीं दामन-दामन,कर दिया तूने अगर मेरे हवाले मुझको| क़तील शिफ़ाई

  • 11th Jan 2022

    आज सता ले मुझको!

    कल की बात और है मैं अब सा रहूँ या न रहूँ,जितना जी चाहे तेरा आज सता ले मुझको| क़तील शिफ़ाई

  • 11th Jan 2022

    देखा नहीं आईने से आगे कुछ भी!

    तूने देखा नहीं आईने से आगे कुछ भी,ख़ुदपरस्ती में कहीं तू न गँवा ले मुझको| क़तील शिफ़ाई

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