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सिलसिला हवस का!
इक सिलसिला हवस का है इंसाँ की ज़िंदगी,इस एक मुश्त-ए-ख़ाक को ग़म दो-जहाँ के हैं| चकबस्त बृज नारायण
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गुल हैं मगर सताए!
अपना मक़ाम शाख़-ए-बुरीदा* है बाग़ में,गुल हैं मगर सताए हुए बाग़बाँ के हैं| *कटी हुई शाख़ चकबस्त बृज नारायण
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शमएँ ज़मीन की हैं!
हम सोचते हैं रात में तारों को देख कर,शमएँ ज़मीन की हैं जो दाग़ आसमाँ के हैं| चकबस्त बृज नारायण
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एक वो भी दिवाली थी!
आज एक बार फिर मैं आपके लिए अपने यूट्यूब चैनल से, अपने प्रिय गायक मुकेश जी का गाया एक लोकप्रिय गीत अपने स्वर में शेयर कर रहा हूँ- एक वो भी दिवाली थी, एक ये भी दिवाली हैhttps://youtu.be/3DB5YgNnF-E आशा है आपको पसंद आएगाधन्यवाद
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जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना!
आप सभी को ज्योति पर्व दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं। आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय गोपाल दास नीरज जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। नीरज जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गोपाल दास नीरज जी का यह गीत – जलाओ दिए पर रहे ध्यान…
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बुतों को देख के!
बुतों को देख के सब ने ख़ुदा को पहचाना,ख़ुदा के घर तो कोई बंदा-ए-ख़ुदा न गया| यगाना चंगेज़ी
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कि मुझ को ले के!
करूँ तो किस से करूँ दर्द-ए-ना-रसा का गिला,कि मुझ को ले के दिल-ए-दोस्त में समा न गया| यगाना चंगेज़ी
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ख़ुदा थे इतने मगर!
पुकारता रहा किस किस को डूबने वाला,ख़ुदा थे इतने मगर कोई आड़े आ न गया| यगाना चंगेज़ी
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किसी पे हँस लिए!
गुनाह-ए-ज़िंदा-दिली कहिए या दिल-आज़ारी,किसी पे हँस लिए इतना कि फिर हँसा न गया| यगाना चंगेज़ी
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ख़ुदी का नश्शा चढ़ा
ख़ुदी का नश्शा चढ़ा आप में रहा न गया,ख़ुदा बने थे ‘यगाना’ मगर बना न गया| यगाना चंगेज़ी