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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 2nd Mar 2022

    हवाओं के पर कतरता है!

    खुली छतों के दिये कब के बुझ गये होते,कोई तो है जो हवाओं के पर कतरता है। वसीम बरेलवी

  • 2nd Mar 2022

    जरा सा क़तरा!

    जरा सा क़तरा कहीं आज अगर उभरता है,समंदरो ही के लहजे में बात करता है। वसीम बरेलवी

  • 2nd Mar 2022

    मुझको क्या-क्या नहीं मिला!

    हिन्दी नवगीत के प्रणेता स्वर्गीय ठाकुर प्रसाद सिंह जी का एक नवगीत आज शेयर कर रहा हूँ| इस नवगीत में उन्होंने जीवन की स्वाभाविक संपन्नताओं के साथ ही विपन्नताओं का उल्लेख किया है और आज के जीवन की जटिलताओं, संकटों की ओर भी बड़ा प्रभावी संकेत किया गया है|लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय ठाकुर प्रसाद…

  • 1st Mar 2022

    ख़याल दिल को मेरे-

    गुज़र गया वो ज़माना कहूँ तो किस से कहूँ, ख़याल दिल को मेरे सुब्ह ओ शाम किसका था| दाग़ देहलवी

  • 1st Mar 2022

    वो पयाम किसका था !

    हमारे ख़त के तो पुर्ज़े किए पढ़ा भी नहीं, सुना जो तू ने ब-दिल वो पयाम किसका था| दाग़ देहलवी

  • 1st Mar 2022

    मक़ाम किसका था!

    रहा न दिल में वो बेदर्द और दर्द रहा, मुक़ीम कौन हुआ है मक़ाम किसका था| दाग़ देहलवी

  • 1st Mar 2022

    ये कलाम किसका था!

    वफ़ा करेंगे निबाहेंगे बात मानेंगे, तुम्हें भी याद है कुछ ये कलाम किसका था| दाग़ देहलवी

  • 1st Mar 2022

    ये काम किसका था!

    वो क़त्ल करके मुझे हर किसी से पूछते हैं, ये काम किसने किया है, ये काम किसका था| दाग़ देहलवी

  • 1st Mar 2022

    आख़िर वो नाम किसका था!

    तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किसका था, न था रक़ीब तो आख़िर वो नाम किसका था| दाग़ देहलवी

  • 1st Mar 2022

    पेड़ कोई हरा गिरा होगा!

    आसमां भर गया परिंदों से,पेड़ कोई हरा गिरा होगा| बशीर बद्र

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