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अक्षरा से!
अपने सेवाकाल के दौरान मुझे, कवि सम्मेलनों का आयोजन करने के कारण हिन्दी के अनेक श्रेष्ठ कवियों/ गीतकारों के संपर्क में आने का अवसर मिला| आज उनमें से ही एक श्रेष्ठ नवगीतकार पटना के श्री सत्यनारायण जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| सत्यनारायण जी पटना में शत्रुघ्न सिन्हा जी के पडौसी और मित्र…
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सूरज से निकलते रहिए!
हो के मायूस न यूँ शाम से ढलते रहिए, ज़िंदगी भोर है सूरज से निकलते रहिए| कुँअर बेचैन
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आपके भी दिल ने बात की!
राहों से जितने प्यार से मंज़िल ने बात की, यूँ दिल से मेरे आपके भी दिल ने बात की| कुँअर बेचैन
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क़दमों पर मैं अपना सर रखूँ!
मौत तो आनी है तो फिर मौत का क्यूँ डर रखूँ, ज़िंदगी आ तेरे क़दमों पर मैं अपना सर रखूँ | कुँअर बेचैन
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मद-मस्त पुरवाई सी तुम!
शोर की इस भीड़ में ख़ामोश तन्हाई सी तुम, ज़िंदगी है धूप, तो मद-मस्त पुरवाई सी तुम| कुँअर बेचैन
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इन्हें निकाल के चल!
अगर ये पाँव में होते तो चल भी सकता था,ये शूल दिल में चुभे हैं इन्हें निकाल के चल। कुँअर बेचैन
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बिना सवाल के चल!
कि उसके दर पे बिना माँगे सब ही मिलता है,चला है रब की तरफ़ तो बिना सवाल के चल। कुँअर बेचैन
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उसको न ऐसे टाल के चल!
कहे जो तुझसे उसे सुन, अमल भी कर उस पर,ग़ज़ल की बात है उसको न ऐसे टाल के चल। कुँअर बेचैन
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देखभाल के चल!
ये लफ़्ज़ आईने हैं मत इन्हें उछाल के चल,अदब की राह मिली है तो देखभाल के चल। कुँअर बेचैन
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हम दरिया का बहता पानी!
आज एक बार फिर से मैं हिन्दी के श्रेष्ठ नवगीतकार स्वर्गीय कुमार शिव जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| कुमार शिव जी को मैंने पहली बार आकाशवाणी, जयपुर में रिकॉर्ड की जा रहे एक कवि सम्मेलन में सुना था| उनकी यह पंक्तियाँ मुझे हमेशा याद रहती हैं- ‘फ्यूज बल्बों के अद्भुद समारोह में,…