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कतरा के तो जाते हो!
कतरा के तो जाते हो दीवाने के रस्ते से,दीवाना लिपट जाए क़दमों से तो क्या होगा| हफ़ीज़ बनारसी
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चुप रहिए तो बर्बादी!
क्या तेरा मुदावा हो दर्द-ए-शब-ए-तन्हाई,चुप रहिए तो बर्बादी कहिए तो गिला होगा| हफ़ीज़ बनारसी
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गुमराह-ए-मोहब्बत!
गुमराह-ए-मोहब्बत हूँ पूछो न मिरी मंज़िल,हर नक़्श-ए-क़दम मेरा मंज़िल का पता होगा| हफ़ीज़ बनारसी
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शायद इसी मरने में!
कुछ सोच के परवाना महफ़िल में जला होगा,शायद इसी मरने में जीने का मज़ा होगा| हफ़ीज़ बनारसी
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आइना हूँ मैं तेरा!
आज एक बार मैं अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से मुकेश जी का गाया एक प्रसिद्ध गीत अपने स्वर में प्रस्तुत कर रहा हूँ- हुस्न ए जानां इधर आ, आइना हूँ मैं तेरा आशा है आपको ये गीत पसंद आएगा। धन्यवाद
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मंज़िल का पता!
हाँ मगर तस्दीक़ में उम्रें गुज़र जाती हैं ‘नूर’,कुछ न कुछ रहता है सब को अपनी मंज़िल का पता| कृष्ण बिहारी नूर
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दूर हम खुद से चले आए!
प्रस्तुत है आज की रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- बने यायावर फिरे, कुछ गीत भी गाएकिंतु कितनी दूर हम खुद से चले आए। था समय जब दोस्तों की महफिलें भी थींकाफिले भी थे, नज़र में मंज़िलें भी थीं,अब कहाँ ठहराव में आकर रुके हैं हमखो गई जीवंतता पहचान जीवन की, भाव जो मन में…
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प्यार सच्चा है तो!
ज़िंदाबाद ऐ दिल मिरे मैं भी हूँ तुझ से मुत्तफ़िक़,प्यार सच्चा है तो फिर कैसी वफ़ा कैसी जफ़ा| कृष्ण बिहारी नूर
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आइना-दर-आइना!
हुस्न-ओ-उलफ़त दोनों हैं अब एक सत्ह पर मगर,आइना-दर-आइना बस आइना-दर-आइना| कृष्ण बिहारी नूर