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अल्फ़ाज़ में पिरोने का!
अगर पलक पे है मोती तो ये नहीं काफ़ी,हुनर भी चाहिए अल्फ़ाज़ में पिरोने का| जावेद अख़्तर
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शौक़ है क्या आस्तीं भिगोने का!
बहाना ढूँढते रहते हैं कोई रोने का,हमें ये शौक़ है क्या आस्तीं भिगोने का| जावेद अख़्तर
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भीड़ में खो गये!
ज़नाब सुदर्शन फ़ाकिर साहब का एक गीत आज शेयर कर रहा हूँ| फ़ाकिर साहब ने बहुत सी प्यारी ग़ज़लें और शेर लिखे हैं जिनको जगजीत सिंह जी और अनेक अन्य प्रसिद्ध गायकों ने गाया है| आज के इस गीत में भी गाँव से जुड़ी यादों को बड़ी खूबसूरती से अभिव्यक्त किया गया है| लीजिए आज…
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कितनी देर लगा दी आने में!
शाम के साये बालिस्तों से नापे हैं,चाँद ने कितनी देर लगा दी आने में| गुलज़ार