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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 10th Nov 2021

    लेना होगा जनम हमें, कई कई बार!

    आज मैं देव आनंद जी की फिल्म ‘प्रेम पुजारी’ के लिए किशोर कुमार जी का गाया एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ, यह गीत नीरज जी ने लिखा था और नीरज जी द्वारा फिल्मों के लिए लिखे गए बहुत प्यारे गीतों में से एक है, इसके संगीत निर्देशक थे फिल्मों में अपनी धुनों के लिए…

  • 9th Nov 2021

    देर तक शैवाल सा हिलता रहा मन!

    बांचते हम रह गए अंतर्कथा,स्वर्णकेशा गीत वधुओं की व्यथा,ले गया चुनकर कंवल, कोई हठी युवराज,देर तक शैवाल सा हिलता रहा मन। किशन सरोज

  • 9th Nov 2021

    हाथ के रूमाल सा, हिलता रहा मन!

    तुम गए क्या जग हुआ अंधा कुआंरेल छूटी रह गया केवल धुआं,हम भटकते ही फिरे बेहाल,हाथ के रूमाल सा, हिलता रहा मन। किशन सरोज

  • 9th Nov 2021

    ताल सा हिलता रहा मन!

    धर गए मेहंदी रचे, दो हाथ जल में दीपजन्म-जन्मों ताल सा हिलता रहा मन। किशन सरोज

  • 9th Nov 2021

    चंदन वन डूब गया 4

    दाह छुपाने को अब हर पल गाना होगा,हंसने वालों में रहकर मुस्काना होगा,घूंघट की ओट किसे होगा संदेह कभी,रतनारे नयनों में एक सपन डूब गया। किशन सरोज

  • 9th Nov 2021

    चंदन वन डूब गया 3

    सोने से दिन, चांदी जैसी हर रात गई,काहे का रोना जो बीती सो बात गई,मत लाओ नैनों में नीर कौन समझेगा,एक बूंद पानी में एक वचन डूब गया। किशन सरोज

  • 9th Nov 2021

    चंदन वन डूब गया 2

    माना सहमी गलियों में न रहा जाएगा,सांसों का भारीपन भी न सहा जाएगा,किंतु विवशता है जब अपनों की बात चली,कांपेंगे अधर और कुछ न कहा जाएगा। किशन सरोज

  • 9th Nov 2021

    चंदन वन डूब गया!

    छोटी से बड़ी हुई तरुओं की छायाएं,धुंधलाई सूरज के माथे की रेखाएं,मत बांधो आंचल में फूल चलो लौट चलें,वह देखो, कोहरे में चंदन वन डूब गया। किशन सरोज

  • 9th Nov 2021

    फिर चाहे दीवाना कर दे या अल्लाह!

    एक बार फिर से आज मैं भारतीय उप महाद्वीप के मशहूर शायर क़तील शिफ़ाई साहब की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| वास्तव में ये कवि, शायर और कलाकार ही होते हैं जिनको देश की सीमा में नहीं बांधा जा सकता| क़तील साहब की बहुत सी ग़ज़लों को अनेक भारतीय और पाकिस्तानी गायकों ने गाया…

  • 8th Nov 2021

    वो अठखेलियां कहाँ राही!

    नजर-नवाज़ वो अठखेलियां कहाँ राही,चले है बाद-ए-सबा अब तो गुल कतरते हुए। मिलाप चंद राही

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