-
बिखर क्यूँ नहीं जाता!
वो ख़्वाब जो बरसों से न चेहरा न बदन है ,वो ख़्वाब हवाओं में बिखर क्यूँ नहीं जाता | निदा फ़ाज़ली
-
उलझी हुई राहों का तमाशा!
मैं अपनी ही उलझी हुई राहों का तमाशा,जाते हैं जिधर सब मैं उधर क्यूँ नहीं जाता| निदा फाज़ली
-
दिल से उतर क्यूँ नहीं जाता !
वो एक ही चेहरा तो नहीं सारे जहाँ में,जो दूर है वो दिल से उतर क्यूँ नहीं जाता| निदा फ़ाज़ली
-
क्या ढूँढती रहती हैं निगाहें!
सब कुछ तो है, क्या ढूँढती रहती हैं निगाहें,क्या बात है मैं वक़्त पे घर क्यूँ नहीं जाता | निदा फ़ाज़ली
-
गुज़र क्यूँ नहीं जाता!
बे-नाम सा ये दर्द ठहर क्यूँ नहीं जाता,जो बीत गया है वो गुज़र क्यूँ नहीं जाता| निदा फ़ाज़ली
-
मैं दिल्ली हूँ मैंने कितनी, रंगीन बहारें देखी हैं!
आज मैं स्वर्गीय रामावतार त्यागी जी ने भारतवर्ष की राजधानी दिल्ली के महाभारत काल से लेकर आज तक के कुछ प्रसंगों को एक कविता में पिरोया था, उसको प्रस्तुत कर रहा हूँ| दिल्ली के बारे में कहा भी जाता है कि ‘दिल’ की तरह दिल्ली भी कितनी बार उजड़ी है और फिर से बसी है|…
-
अजीब आज की दुनिया का व्याकरण देखा!
ज़बाँ है और बयाँ और उसका मतलब और,अजीब आज की दुनिया का व्याकरण देखा| नीरज