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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 15th Nov 2021

    बिखर क्यूँ नहीं जाता!

    वो ख़्वाब जो बरसों से न चेहरा न बदन है ,वो ख़्वाब हवाओं में बिखर क्यूँ नहीं जाता | निदा फ़ाज़ली

  • 15th Nov 2021

    उलझी हुई राहों का तमाशा!

    मैं अपनी ही उलझी हुई राहों का तमाशा,जाते हैं जिधर सब मैं उधर क्यूँ नहीं जाता| निदा फाज़ली

  • 15th Nov 2021

    दिल से उतर क्यूँ नहीं जाता !

    वो एक ही चेहरा तो नहीं सारे जहाँ में,जो दूर है वो दिल से उतर क्यूँ नहीं जाता| निदा फ़ाज़ली

  • 15th Nov 2021

    क्या ढूँढती रहती हैं निगाहें!

    सब कुछ तो है, क्या ढूँढती रहती हैं निगाहें,क्या बात है मैं वक़्त पे घर क्यूँ नहीं जाता | निदा फ़ाज़ली

  • 15th Nov 2021

    गुज़र क्यूँ नहीं जाता!

    बे-नाम सा ये दर्द ठहर क्यूँ नहीं जाता,जो बीत गया है वो गुज़र क्यूँ नहीं जाता| निदा फ़ाज़ली

  • 15th Nov 2021

    मैं दिल्ली हूँ मैंने कितनी, रंगीन बहारें देखी हैं!

    आज मैं स्वर्गीय रामावतार त्यागी जी ने भारतवर्ष की राजधानी दिल्ली के महाभारत काल से लेकर आज तक के कुछ प्रसंगों को एक कविता में पिरोया था, उसको प्रस्तुत कर रहा हूँ| दिल्ली के बारे में कहा भी जाता है कि ‘दिल’ की तरह दिल्ली भी कितनी बार उजड़ी है और फिर से बसी है|…

  • 14th Nov 2021

    संतों का आचरण देखा!

    लुटेरे डाकू भी अपने पे नाज़ करने लगे,उन्होंने आज जो संतों का आचरण देखा| नीरज

  • 14th Nov 2021

    अजीब आज की दुनिया का व्याकरण देखा!

    ज़बाँ है और बयाँ और उसका मतलब और,अजीब आज की दुनिया का व्याकरण देखा| नीरज

  • 14th Nov 2021

    एक सा कफ़न देखा!

    बड़ा न छोटा कोई फ़र्क़ बस नज़र का है,सभी पे चलते समय एक सा कफ़न देखा| नीरज

  • 14th Nov 2021

    घायल कोई हिरन देखा!

    मुझे मिला है वहाँ अपना ही बदन ज़ख़्मी,कहीं जो तीर से घायल कोई हिरन देखा| नीरज

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