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फलाने से फलाने से मिले!
हम तरसते ही तरसते ही तरसते ही रहे,वो फलाने से फलाने से फलाने से मिले| कैफ़ भोपाली
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जख़्म ज़माने से मिले!
दाग दुनिया ने दिए जख़्म ज़माने से मिले,हम को तोहफे ये तुम्हें दोस्त बनाने से मिले| कैफ़ भोपाली
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मुश्किल इस नादान को समझाना होता है!
आज एक गीत 1971 की फिल्म ‘स्वीटहार्ट’ से, हमारे प्रिय गायक मुकेश जी के मधुर स्वर में, इसका संगीत तैयार किया है कल्याणजी आनंदजी की संगीतमय जोड़ी ने और गीत लिखा था आनंद बख्शी जी ने| मुझे यह गीत विशेष रूप से प्रिय है और इसमें लेखन, संगीत और अदायगी सभी लाजवाब हैं लीजिए प्रस्तुत…
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हुई वही किताब ग़ुम|
लिखा हुआ था जिस किताब में, कि इश्क़ तो हराम है,हुई वही किताब ग़ुम, बड़ी हसीन रात थी| सुदर्शन फाक़िर
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अश्कों का समंदर क्यूँ है!
ज़िन्दगी जीने के क़ाबिल ही नहीं अब “फ़ाकिर”वर्ना हर आँख में अश्कों का समंदर क्यूँ है| सुदर्शन फाक़िर
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हर इन्सान सिकंदर क्यूँ है!
अपना अंजाम तो मालूम है सबको फिर भी,अपनी नज़रों में हर इन्सान सिकंदर क्यूँ है| सुदर्शन फाक़िर
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फिर ज़मीं पर कहीं–
जब हक़ीक़त है के हर ज़र्रे में तू रहता है,फिर ज़मीं पर कहीं मस्जिद कहीं मंदिर क्यूँ है| सुदर्शन फाक़िर
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हर इक हाथ में पत्थर क्यूँ है!
आज के दौर में ऐ दोस्त ये मंज़र क्यूँ है,ज़ख़्म हर सर पे, हर इक हाथ में पत्थर क्यूँ है| सुदर्शन फाक़िर
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कि मैं ज़िन्दा हूँ अभी!
ज़हर पीने की तो आदत थी ज़माने वालोंअब कोई और दवा दो कि मैं ज़िन्दा हूँ अभी| सुदर्शन फाक़िर
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क़ातिल की निगाहों की तरह!
ग़म बढे़ आते हैं क़ातिल की निगाहों की तरह,तुम छिपा लो मुझे, ऐ दोस्त, गुनाहों की तरह| सुदर्शन फाक़िर