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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 3rd Aug 2022

    सामने फ्लैट पर!

    स्वर्गीय रवींद्रनाथ त्यागी जी की पहचान मुख्य रूप से एक व्यंग्य लेखक के रूप में थी लेकिन उन्होंने कुछ सुंदर कविताएं भी लिखी थीं| आज मैं स्वर्गीय रवींद्रनाथ त्यागी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ जिसमें दिन का चित्रण देखिए किस-किस रूप में किया गया है| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रवींद्रनाथ त्यागी…

  • 2nd Aug 2022

    कौन जवाँ कौन हसीं रहता है!

    दिल फ़सुर्दा तो हुआ देख के उस को लेकिन, उम्र भर कौन जवाँ कौन हसीं रहता है| अहमद मुश्ताक़

  • 2nd Aug 2022

    वक़्त का एहसास नहीं रहता है!

    रोज़ मिलने पे भी लगता था कि जुग बीत गए, इश्क़ में वक़्त का एहसास नहीं रहता है| अहमद मुश्ताक़

  • 2nd Aug 2022

    कोई कहीं कोई कहीं रहता है!

    इक ज़माना था कि सब एक जगह रहते थे, और अब कोई कहीं कोई कहीं रहता है| अहमद मुश्ताक़

  • 2nd Aug 2022

    कहाँ अब वो मकीं रहता है!

    जिसकी साँसों से महकते थे दर-ओ-बाम तिरे, ऐ मकाँ बोल कहाँ अब वो मकीं रहता है| अहमद मुश्ताक़

  • 2nd Aug 2022

    शहर की गलियों में कहीं रहता है!

    मिल ही जाएगा कभी दिल को यक़ीं रहता है, वो इसी शहर की गलियों में कहीं रहता है| अहमद मुश्ताक़

  • 2nd Aug 2022

    मगर आँसू निकल पड़े!

    मुद्दत के बा’द उसने जो की लुत्फ़ की निगाह, जी ख़ुश तो हो गया मगर आँसू निकल पड़े| कैफ़ी आज़मी

  • 2nd Aug 2022

    नाम पे जिसके उबल पड़े!

    साक़ी सभी को है ग़म-ए-तिश्ना-लबी मगर, मय है उसी की नाम पे जिसके उबल पड़े| कैफ़ी आज़मी

  • 2nd Aug 2022

    कलेजा निकल पड़े!

    जिस तरह हँस रहा हूँ मैं पी पी के गर्म अश्क, यूँ दूसरा हँसे तो कलेजा निकल पड़े| कैफ़ी आज़मी

  • 2nd Aug 2022

    ज़िंदगी में किसी के ख़लल पड़े!

    इतना तो ज़िंदगी में किसी के ख़लल पड़े, हँसने से हो सुकून न रोने से कल पड़े| कैफ़ी आज़मी

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