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सुहानी चांदनी रातें|
आज एक गीत फिल्म ‘मुक्ति’ से, हमारे प्रिय गायक मुकेश जी के मधुर स्वर में, इसका संगीत तैयार किया है राहुल देव बर्मन जी ने और गीत लिखा था आनंद बख्शी जी ने| मुकेश जी का यह रोमांटिक गीत आज भी हमारे मन में गूंजता रहता है| लीजिए प्रस्तुत हैं फिल्म- ‘मुक्ति’ के लिए मुकेश…
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जिएं तो अपने बग़ीचे में–
जिएं तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले,मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिए| दुष्यंत कुमार
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सिल दे ज़ुबान शायर की!
तेरा निज़ाम है सिल दे ज़ुबान शायर की,ये एहतियात ज़रूरी है इस बहर के लिए| दुष्यंत कुमार
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आवाज़ में असर के लिए!
वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता,मैं बेक़रार हूँ आवाज़ में असर के लिए| दुष्यंत कुमार
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आदमी का ख़्वाब सही!
ख़ुदा नहीं न सही, आदमी का ख़्वाब सही,कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिए| दुष्यंत कुमार
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मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए!
न हो कमीज़ तो पाँवों से पेट ढँक लेंगे,ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए| दुष्यंत कुमार
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साये में धूप लगती है
यहाँ दरख्तों के साये में धूप लगती है,चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए| दुष्यंत कुमार