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हँसाते-हँसाते रूलाया गया हूँ !
स्वर्गीय बलबीर सिंह ‘रंग’ जी हिन्दी साहित्य मंच के एक अनूठे कवि थे, उनकी अभिव्यक्ति शैली अलग तरह की थी, अक्सर एक कवि के रूप में वे अपनी बात करते थे, आज भी मैं ‘आत्माभिव्यक्ति शैली में मैं लिखी गई उनकी एक कविता शेयर कर रहा हूँ| लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय बलबीर सिंह ‘रंग’ जी…
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कभी आ के चुरा ले मुझको!
मैं खुले दर के किसी घर का हूँ सामां प्यारे,तू दबे पाँव कभी आ के चुरा ले मुझको| क़तील शिफ़ाई
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जूड़े में सजा ले मुझको!
मैं जो कांटा हूँ तो चल मुझसे बचाकर दामन,मैं हूँ गर फूल तो जूड़े में सजा ले मुझको| क़तील शिफ़ाई
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कर दिया तूने अगर–
ख़ुद को मैं बांट न डालूं कहीं दामन-दामन,कर दिया तूने अगर मेरे हवाले मुझको| क़तील शिफ़ाई
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आज सता ले मुझको!
कल की बात और है मैं अब सा रहूँ या न रहूँ,जितना जी चाहे तेरा आज सता ले मुझको| क़तील शिफ़ाई
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देखा नहीं आईने से आगे कुछ भी!
तूने देखा नहीं आईने से आगे कुछ भी,ख़ुदपरस्ती में कहीं तू न गँवा ले मुझको| क़तील शिफ़ाई
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नाम मेरा लेके बुला ले मुझको!
मैं समंदर भी हूँ, मोती भी हूँ, ग़ोताज़न भी,कोई भी नाम मेरा लेके बुला ले मुझको| क़तील शिफ़ाई