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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 16th Jan 2022

    आँधियों ने गोद में हमको खिलाया है !

    आज मैं हिन्दी के श्रेष्ठ रचनाकार और कादंबिनी पत्रिका के यशस्वी संपादक रहे स्वर्गीय रामानंद दोषी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| दोषी जी का गीत ‘मन होता है पारा, ऐसे देखा नहीं करो’ बहुत प्रसिद्ध हुआ था| इस रचना में दोषी जी ने हमारे महान राष्ट्र की गौरव वंदना बड़े श्रेष्ठ तरीके…

  • 15th Jan 2022

    कोई दरीचा खुला न था!

    राशिद किसे सुनाते गली में तेरी गज़ल,उसके मकां का कोई दरीचा खुला न था। मुमताज़ राशिद

  • 15th Jan 2022

    हवा का पता न था!

    पत्तों के टूटने की सदा घुट के रह गई,जंगल में दूर-दूर, हवा का पता न था। मुमताज़ राशिद

  • 15th Jan 2022

    अपना शरीक-ए-ग़म!

    परछाइयों के शहर की तनहाइयां न पूछ,अपना शरीक-ए-ग़म कोई अपने सिवा न था। मुमताज़ राशिद

  • 15th Jan 2022

    उधर रास्ता न था!

    पत्थर सुलग रहे थे कोई नक्श-ए-पा न था,हम जिस तरफ़ चले थे उधर रास्ता न था। मुमताज़ राशिद

  • 15th Jan 2022

    कौन थकान हरे जीवन की?

    अज्ञेय जी द्वारा संपादित तारसप्तक के माध्याम से हिन्दी में नई कविता का युग प्रारंभ हुआ था, इसमें संकलित कवियों के संबंध मे अज्ञेय जी ने लिखा था कि वे एक दूसरे से और एक दूसरे के कुत्तों से भी नफरत करते हैं, परंतु वे सभी कविता के नए युग के प्रतिनिधि हैं| तारसप्तक के…

  • 14th Jan 2022

    मैं पल दो पल का शायर हूँ!

    मुझसे पहले कितने शायर, आए और आकर चले गए,कुछ आहें भरकर लौट गए, कुछ नग़मे गाकर चले गए,क्यों कोई मुझको याद करे, क्यों कोई मुझको याद करे, मसरूफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यों वक़्त अपना बर्बाद करे| मैं पल दो पल का शायर हूँ, पल दो पल मेरी कहानी है|पल दो पल मेरी हस्ती है, पल…

  • 14th Jan 2022

    नग़मों की खिलाती कलियां चुनने वाले!

    कल और आएंगे नग़मों की खिलाती कलियां चुनने वाले,मुझसे बहते कहने वाले, तुमसे बेहतर सुनने वाले| साहिर लुधियानवी

  • 14th Jan 2022

    झूठ बोलता ही नहीं

    जड़ दो चांदी में चाहे सोने में,आईना झूठ बोलता ही नहीं। कृष्ण बिहारी ‘नूर’

  • 14th Jan 2022

    मिल जाना क्या, न मिलना क्या!

    उसका मिल जाना क्या, न मिलना क्याख्वाब-दर-ख्वाब कुछ मज़ा ही नहीं। कृष्ण बिहारी ‘नूर’

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