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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 28th Feb 2022

    उसको भूल जाने में!

    दूसरी कोई लड़की, ज़िंदगी में आएगी,कितनी देर लगती है, उसको भूल जाने में| बशीर बद्र

  • 28th Feb 2022

    फ़ाख़्ता की मजबूरी!

    फ़ाख़्ता की मजबूरी ,ये भी कह नहीं सकती,कौन साँप रखता है, उसके आशियाने में| बशीर बद्र

  • 28th Feb 2022

    दिल को दिल बनाने में!

    हर धड़कते पत्थर को, लोग दिल समझते हैं,उम्र बीत जाती है, दिल को दिल बनाने में| बशीर बद्र

  • 28th Feb 2022

    और जाम टूटेंगे–

    और जाम टूटेंगे, इस शराबख़ाने में,मौसमों के आने में, मौसमों के जाने में| बशीर बद्र

  • 28th Feb 2022

    तुम तरस नहीं खाते–

    लोग टूट जाते हैं, एक घर बनाने में,तुम तरस नहीं खाते, बस्तियाँ जलाने में| बशीर बद्र

  • 28th Feb 2022

    आ गए किस द्वीप में हम!

    एक बार फिर से मैं आज माननीय सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| सोम जी ने जहां राष्ट्रप्रेम, राजभाषा प्रेम और रूमानी प्रेम के एक से एक बढ़कर गीत लिखे हैं वहीं मानवीय सरोकारों को भी बड़ी सशक्त अभिव्यक्ति दी है| लीजिए आज प्रस्तुत है माननीय सोम ठाकुर जी का, आज…

  • 27th Feb 2022

    कोई हमदम होता है!

    ग़ैरों को कब फ़ुरसत है दुख देने की,जब होता है कोई हमदम होता है| जावेद अख़्तर

  • 27th Feb 2022

    फैला जंगल रस्ता गुम!

    ढलता सूरज फैला जंगल रस्ता गुम,हमसे पूछो कैसा आलम होता है| जावेद अख़्तर

  • 27th Feb 2022

    बेकार हमें ग़म होता है!

    सच ये है बेकार हमें ग़म होता है,जो चाहा था दुनिया में कम होता है| जावेद अख़्तर

  • 27th Feb 2022

    हमने फ़ाक़े झेले थे!

    ज़हनो-दिल आज भूखे मरते हैं,उन दिनों हमने फ़ाक़े झेले थे| जावेद अख़्तर

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