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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 22nd Sep 2022

    मुझे तूने मुसीबत से निकाला!

    ऐ मौत मुझे तूने मुसीबत से निकाला, सय्याद समझता था रिहा हो नहीं सकता| मुनव्वर राना

  • 22nd Sep 2022

    इस शहर में क्या हो नहीं सकता!

    बस तू मिरी आवाज़ से आवाज़ मिला दे, फिर देख कि इस शहर में क्या हो नहीं सकता| मुनव्वर राना

  • 22nd Sep 2022

    इतना तो दिया हो नहीं सकता!

    दहलीज़ पे रख दी हैं किसी शख़्स ने आँखें, रौशन कभी इतना तो दिया हो नहीं सकता| मुनव्वर राना

  • 22nd Sep 2022

    ज़ियादा मैं तिरा हो नहीं सकता!

    मिट्टी में मिला दे कि जुदा हो नहीं सकता, अब इससे ज़ियादा मैं तिरा हो नहीं सकता| मुनव्वर राना

  • 22nd Sep 2022

    जहाँ पहुँचे कामयाब आए!

    ‘फ़ैज़’ थी राह सर-ब-सर मंज़िल, हम जहाँ पहुँचे कामयाब आए| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 22nd Sep 2022

    तुलना!

    लंबे समय के बाद आज मैं स्वर्गीय दुष्यंत कुमार जी की एक और सुंदर कविता शेयर कर रहा हूँ| दुष्यंत जी आपातकाल में प्रकाशित अपने ग़ज़ल संग्रह ‘साए में धूप’ के कारण बहुत प्रसिद्ध हो गए थे, मैंने शुरू में उनकी ग़ज़लें शेयर की थीं लेकिन कई बार से मैं उनकी अन्य कविताएं शेयर कर…

  • 21st Sep 2022

    हर सम्त से जवाब आए!

    इस तरह अपनी ख़ामुशी गूँजी, गोया हर सम्त से जवाब आए| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 21st Sep 2022

    जब भी हम ख़ानुमाँ-ख़राब आए!

    जल उठे बज़्म-ए-ग़ैर के दर-ओ-बाम, जब भी हम ख़ानुमाँ-ख़राब आए| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 21st Sep 2022

    दिल में यूँ रोज़ इंक़लाब आए!

    न गई तेरे ग़म की सरदारी, दिल में यूँ रोज़ इंक़लाब आए| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 21st Sep 2022

    आज तुम याद बे-हिसाब आए!

    कर रहा था ग़म-ए-जहाँ का हिसाब, आज तुम याद बे-हिसाब आए| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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