-
करवटें, बेताबियाँ, अँगड़ाइयाँ!
क्या ज़माने में यूँ ही कटती है रात,करवटें, बेताबियाँ, अँगड़ाइयाँ| कैफ़ भोपाली
-
चेतावनी!
एक बार फिर से मैं आज श्रेष्ठ कवि, गीतकार श्री सत्यनारायण जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ, जो पटना निवासी हैं, शत्रुघ्न सिन्हा जी के पडौसी और मित्र हैं और मुझको, उनको अपना मित्र कहने में गर्व का अनुभव होता है| यद्यपि 11 साल पहले एनटीपीसी से सेवानिवृत्त होने के और गोवा में…
-
जिनसे हमें उल्फत भी थी!
क्या क़यामत है ‘मुनीर’ अब याद भी आते नहीं,वो पुराने आशना जिनसे हमें उल्फत भी थी| मुनीर नियाज़ी
-
शहरों में रहते उम्र सारी कट गई!
अजनबी शहरों में रहते उम्र सारी कट गई,गो ज़रा से फासले पर घर की हर राहत भी थी| मुनीर नियाज़ी
-
कुछ मेरी हिम्मत भी थी!
कह गया मैं सामने उसके जो दिल का मुद्दआ,कुछ तो मौसम भी अजब था, कुछ मेरी हिम्मत भी थी| मुनीर नियाज़ी
-
तामीर की हसरत भी थी!
जो हवा में घर बनाया काश कोई देखता,दश्त में रहते थे पर तामीर की हसरत भी थी| मुनीर नियाज़ी
-
इक शक्ल की हसरत भी थी!
फूल थे बादल भी था, और वो हसीं सूरत भी थी,दिल में लेकिन और ही इक शक्ल की हसरत भी थी| मुनीर नियाज़ी
-
जमुन – जल मेघ!
आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ कवि, गीतकार, संपादक और राजभाषा से जुड़े उच्च अधिकारी रहे, माननीय डॉक्टर बुदधिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| डॉक्टर मिश्र की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं, आज का यह नवगीत उनके नवगीत संग्रह- ‘शिखरिणी’ से लिया गया है|मौसम के छविचित्र को अपने…