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अँधेरों को दिए जाते हैं!
हम हैं एक शम्अ मगर देख के बुझते बुझते, रौशनी कितने अँधेरों को दिए जाते हैं| शमीम जयपुरी
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ये सज़ा कम तो नहीं है के!
क्यूँ हमें मौत के पैग़ाम दिए जाते हैं, ये सज़ा कम तो नहीं है के जिए जाते हैं| शमीम जयपुरी
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वो मिट जाता है इक दिन!
जो दिखता है वो मिट जाता है इक दिन,नहीं दिखता वो, जो फ़ानी नहीं है| राजेश रेड्डी
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एक छोटी सी मुलाकात!
स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी हिन्दी में अपनी तरह के एक अनूठे कवि थे| उनकी एक कविता जो अक्सर मुझे याद आती है, वह है- ‘उठ मेरी बेटी सुबह हो गई’ जिसमें एक लाचार पिता अपनी बच्ची को जीवन की कुछ समझाता है| लीजिए प्रस्तुत है, स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की यह कविता, जिसका…
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मेरा रहबर लेके आया है!
न मंज़िल है न मंज़िल की है कोई दूर तक उम्मीद,ये किस रस्ते पे मुझको मेरा रहबर लेके आया है| राजेश रेड्डी