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कितनी देर लगा दी आने में!
शाम के साये बालिस्तों से नापे हैं,चाँद ने कितनी देर लगा दी आने में| गुलज़ार
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किसका ज़िक्र है इस अफ़साने में!
जाने किसका ज़िक्र है इस अफ़साने में,दर्द मज़े लेता है जो दुहराने में| गुलज़ार
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सुनाई पड़ते हैं|
आज एक बार फिर मैं स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| भवानी दादा हिन्दी के एक अनूठे कवि थे, आज की इस कविता में भवानी दादा ने अपने उन परिजनों को एक अलग अंदाज़ में याद किया है जो उनको छोड़कर जा चुके थे| लीजिए आज प्रस्तुत है, स्वर्गीय…
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हमीं ने शाम चुनी है!
सहर भी, रात भी, दोपहर भी मिली लेकिन,हमीं ने शाम चुनी है, नहीं उदास नहीं| गुलज़ार
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मिली जो, ख़ूब मिली है!
कोई अनोखी नहीं ऐसी ज़िंदगी लेकिन,मिली जो, ख़ूब मिली है, नहीं उदास नहीं| गुलज़ार
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बस एक चुप-सी लगी है!
बस एक चुप-सी लगी है, नहीं उदास नहीं,कहीं पे साँस रुकी है, नहीं उदास नहीं| गुलज़ार