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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 4th May 2022

    अधूरा दिखाई पड़ता है!

    न कोई ख़्वाब न कोई ख़लिश न कोई ख़ुमार,ये आदमी तो अधूरा दिखाई पड़ता है| जाँ निसार अख़्तर

  • 4th May 2022

    प्यार का भूखा दिखाई देता है!

    चलो कि अपनी मोहब्बत सभी को बाँट आएँ,हर एक प्यार का भूखा दिखाई देता है| जाँ निसार अख़्तर

  • 4th May 2022

    कोई चेहरा दिखाई पड़ता है!

    हमारे शहर में बे-चेहरा लोग बसते हैं,कभी-कभी कोई चेहरा दिखाई पड़ता है| जाँ निसार अख़्तर

  • 4th May 2022

    सवेरा दिखाई पड़ता है!

    उफ़ुक़ अगरचे पिघलता दिखाई पड़ता है,मुझे तो दूर सवेरा दिखाई पड़ता है| जाँ निसार अख़्तर

  • 4th May 2022

    सागर के किनारे!

    हिन्दी साहित्य की महान विभूति स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय जी की एक कविता आज शेयर कर रहा हूँ| अज्ञेय जी तारसप्तक और तीन सप्तकों के माध्यम से अनेक कवियों का साहित्य हमारे सामने लाने का माध्यम बने थे| अज्ञेय जी का उपन्यास ‘शेखर एक जीवनी’ एक महान रचना है और भी अनेक उपन्यास और…

  • 3rd May 2022

    मेरा घर जलाने वाले थे!

    मैं जिनको जान के, पहचान भी नहीं सकता,कुछ ऐसे लोग मेरा घर जलाने वाले थे| वसीम बरेलवी

  • 3rd May 2022

    हदें भूल जाने वाले थे!

    उन्हें क़रीब न होने दिया कभी मैंने,जो दोस्ती में हदें भूल जाने वाले थे| वसीम बरेलवी

  • 3rd May 2022

    कौन से ऊँचे घराने वाले थे!

    उन्हें तो ख़ाक में मिलना ही था कि मेरे थे,ये अश्क कौन से ऊँचे घराने वाले थे| वसीम बरेलवी

  • 3rd May 2022

    मुस्कुराने वाले थे!

    भला ग़मों से कहाँ हार जाने वाले थे,हम आँसुओं की तरह मुस्कुराने वाले थे| वसीम बरेलवी

  • 3rd May 2022

    मुझसे शरमाता नहीं!

    तुझसे क्या बिछड़ा मेरी सारी हक़ीक़त खुल गई,अब कोई मौसम मिले तो मुझसे शरमाता नहीं। वसीम बरेलवी

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