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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 8th May 2022

    तेरे बदन की महक छा गई!

    अपनी साँसों की ख़ुशबू लगे अजनबी,मुझ पर तेरे बदन की महक छा गई। नक़्श लायलपुरी

  • 8th May 2022

    नवनिर्माण का संकल्प!

    नवगीत आंदोलन के शिखर पुरूष स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का एक नवगीत आज शेयर कर रहा हूँ| यह गीत एक तरह से सभी रचनाकारों और सजग नागरिकों की तरफ से एक संकल्प गीत है|लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का यह नवगीत – विषम भूमि नीचे, निठुर व्योम ऊपर! यहाँ राह अपनी बनाने…

  • 7th May 2022

    बदी के सामने नेकी अभी तक!

    बदी के सामने नेकी अभी तक,सिपर-अंदाज़ होती जा रही है| आनंद नारायण ‘मुल्ला’

  • 7th May 2022

    आवाज़ होती जा रही है!

    नहीं आता समझ में शोर-ए-हस्ती,बस इक आवाज़ होती जा रही है| आनंद नारायण ‘मुल्ला’

  • 7th May 2022

    आवाज़ होती जा रही है!

    ख़मोशी साज़ होती जा रही है,नज़र आवाज़ होती जा रही है| आनंद नारायण ‘मुल्ला’

  • 7th May 2022

    मै-कदों में मगर दूर दूर था!

    ‘मुल्ला’ का मस्जिदों में तो हमने सुना न नाम,ज़िक्र उसका मै-कदों में मगर दूर दूर था| आनंद नारायण ‘मुल्ला’

  • 7th May 2022

    चेहरे पे नूर था!

    पीते तो हमने शैख़ को देखा नहीं मगर,निकला जो मै-कदे से तो चेहरे पे नूर था| आनंद नारायण ‘मुल्ला’

  • 7th May 2022

    जिसे जितना शुऊर था!

    इस इक नज़र के बज़्म में क़िस्से बने हज़ार,उतना समझ सका जिसे जितना शुऊर था| आनंद नारायण ‘मुल्ला’

  • 7th May 2022

    क़ुसूर न करना क़ुसूर था!

    उसके करम पे शक तुझे ज़ाहिद ज़रूर था,वरना तेरा क़ुसूर न करना क़ुसूर था| आनंद नारायण ‘मुल्ला’

  • 7th May 2022

    बिछड़ना ज़रूर था!

    दुनिया है ये किसी का न इसमें क़ुसूर था,दो दोस्तों का मिल के बिछड़ना ज़रूर था| आनंद नारायण ‘मुल्ला’

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