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तुम जला दो आशियाँ मेरा!
सुकूँ पाएँ चमन वाले हर इक घर रोशनी पहुँचे,मुझे अच्छा लगेगा तुम जला दो आशियाँ मेरा| बेकल उत्साही
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कुछ नहीं पूछा -रवीन्द्रनाथ ठाकुर
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट दोहराने का दिन है| प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया…
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और फैला है धुआँ मेरा!
किसी बस्ती को जब जलते हुए देखा तो ये सोचा,मैं ख़ुद ही जल रहा हूँ और फैला है धुआँ मेरा| बेकल उत्साही
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ठिकाना है कहाँ मेरा!
सुनहरी सरज़मीं मेरी, रुपहला आसमाँ मेरा,मगर अब तक नहीं समझा, ठिकाना है कहाँ मेरा| बेकल उत्साही
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सुर्ख़ियों मे बिखेरता है मुझे!
सुब्ह अख़बार की हथेली पर,सुर्ख़ियों मे बिखेरता है मुझे| बेकल उत्साही
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आकुल अंतर!
आज फिर से सुरीले गीतों के सृजक और कवि कुल के गौरव सीनियर बच्चन जी, अर्थात स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| कवि जब व्याकुलता का अनुभव करता है तो वह सभी को किसी न किसी रूप में अपनी व्याकुलता में शामिल कर लेता है| लीजिए आज प्रस्तुत है, स्वर्गीय…
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तन्हाई नहीं जाने वाली!
आज सड़कों पे चले आओ तो दिल बहलेगा,चन्द ग़ज़लों से तन्हाई नहीं जाने वाली| दुष्यंत कुमार
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ख़ुदाई नहीं जाने वाली!
तू परेशां है, तू परेशान न हो,इन ख़ुदाओं की ख़ुदाई नहीं जाने वाली| दुष्यंत कुमार