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नींद भी मेरे नयन की!
एक बार फिर मैं हिन्दी के सुरीले गीतकार, जिनको हम गीतों के राजकुंवर भी कहते हैं और जिन्होंने हिन्दी काव्य मंचों, काव्य साहित्य और हिन्दी फिल्मों में अपनी अमिट छाप छोड़ी है, ऐसे स्वर्गीय गोपाल दास ‘नीरज’ जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| यह गीत भी उन गीतों में शामिल है जिनको शायद…
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नहीं कोई मकाँ मेरा!
मैं जब लौटा तो कोई और ही आबाद था “बेकल”,मैं इक रमता हुआ जोगी, नहीं कोई मकाँ मेरा| बेकल उत्साही
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यही जन्नत निशाँ मेरा!
कहीं बारूद फूलों में, कहीं शोले शिगूफ़ों में,ख़ुदा महफ़ूज़ रक्खे, है यही जन्नत निशाँ मेरा| बेकल उत्साही
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ये अन्दाज़-ए-बयाँ मेरा!
पड़ेगा वक़्त जब मेरी दुआएँ काम आएंगी,अभी कुछ तल्ख़ लगता है ये अन्दाज़-ए-बयाँ मेरा| बेकल उत्साही
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गुबारे-कारवाँ मेरा!
बचाकर रख उसे मंज़िल से पहले रूठने वाले,तुझे रस्ता दिखाएगा गुबारे-कारवाँ मेरा| बेकल उत्साही