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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 4th Jul 2022

    मुस्कुरा तो दिये थे वो आज ’फ़ैज़!

    भूले से मुस्कुरा तो दिये थे वो आज ’फ़ैज़,’मत पूछ वलवले दिले-नाकर्दःकार के| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 4th Jul 2022

    दिलफ़रेब हैं ग़म रोज़गार के!

    दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया,तुम से भी दिलफ़रेब हैं ग़म रोज़गार के| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 4th Jul 2022

    हौसले परवरदिगार के!

    इक फ़ुर्सते-गुनाह मिली, वो भी चार दिन,देखें हैं हमने हौसले परवरदिगार के| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 4th Jul 2022

    रूठ गए दिन बहार के!

    वीराँ है मयकदा ख़ुमो-सागर उदास हैं,तुम क्या गये कि रूठ गए दिन बहार के| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 4th Jul 2022

    जा रहा है कोई शबे-ग़म गुज़ार के!

    दोनों जहान तेरी मोहब्बत मे हार के,वो जा रहा है कोई शबे-ग़म गुज़ार के| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 4th Jul 2022

    तुम भीतर!

    एक बार फिर से मैं आज स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| भवानी दादा बड़े सहज अंदाज़ में अपनी गहरी बात कह जाते थे| आज की कविता में भवानी दादा ने यह विषय रखा है कि किस प्रकार अपने भीतर को बाहर से जोड़ने पर ही रचनाकार प्रभावी रचना…

  • 3rd Jul 2022

    अल्लाह का घर लगता है!

    बुत भी रक्खे हैं नमाज़ें भी अदा होती हैं, दिल मेरा दिल नहीं अल्लाह का घर लगता है| बशीर बद्र

  • 3rd Jul 2022

    तन्हाई में मिलते हुए डर लगता है!

    मुझ में रहता है कोई दुश्मन-ए-जानी मेरा, ख़ुद से तन्हाई में मिलते हुए डर लगता है| बशीर बद्र

  • 3rd Jul 2022

    छूते हुए डर लगता है!

    सर से पा तक वो गुलाबों का शजर लगता है, बा-वज़ू हो के भी छूते हुए डर लगता है| बशीर बद्र

  • 3rd Jul 2022

    तुमने लफ़्ज़ों से बेवफ़ाई की!

    अब तरसते रहो ग़ज़ल के लिए, तुमने लफ़्ज़ों से बेवफ़ाई की| बशीर बद्र

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