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मुस्कुरा तो दिये थे वो आज ’फ़ैज़!
भूले से मुस्कुरा तो दिये थे वो आज ’फ़ैज़,’मत पूछ वलवले दिले-नाकर्दःकार के| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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दिलफ़रेब हैं ग़म रोज़गार के!
दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया,तुम से भी दिलफ़रेब हैं ग़म रोज़गार के| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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हौसले परवरदिगार के!
इक फ़ुर्सते-गुनाह मिली, वो भी चार दिन,देखें हैं हमने हौसले परवरदिगार के| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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जा रहा है कोई शबे-ग़म गुज़ार के!
दोनों जहान तेरी मोहब्बत मे हार के,वो जा रहा है कोई शबे-ग़म गुज़ार के| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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तुम भीतर!
एक बार फिर से मैं आज स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| भवानी दादा बड़े सहज अंदाज़ में अपनी गहरी बात कह जाते थे| आज की कविता में भवानी दादा ने यह विषय रखा है कि किस प्रकार अपने भीतर को बाहर से जोड़ने पर ही रचनाकार प्रभावी रचना…
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अल्लाह का घर लगता है!
बुत भी रक्खे हैं नमाज़ें भी अदा होती हैं, दिल मेरा दिल नहीं अल्लाह का घर लगता है| बशीर बद्र
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तन्हाई में मिलते हुए डर लगता है!
मुझ में रहता है कोई दुश्मन-ए-जानी मेरा, ख़ुद से तन्हाई में मिलते हुए डर लगता है| बशीर बद्र
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छूते हुए डर लगता है!
सर से पा तक वो गुलाबों का शजर लगता है, बा-वज़ू हो के भी छूते हुए डर लगता है| बशीर बद्र