-
तन्हा हूँ तो कोई नहीं आने वाला!
तेरे होते हुए आ जाती थी सारी दुनिया, आज तन्हा हूँ तो कोई नहीं आने वाला| अहमद फ़राज़
-
शख़्स है मुँह फेर के जाने वाला!
क्या कहें कितने मरासिम थे हमारे उससे, वो जो इक शख़्स है मुँह फेर के जाने वाला| अहमद फ़राज़
-
ग़ुंचा-ए-दिल में सिमट आने वाला!
सुब्ह-दम छोड़ गया निकहत-ए-गुल की सूरत, रात को ग़ुंचा-ए-दिल में सिमट आने वाला| अहमद फ़राज़
-
अंदाज़ है ज़ालिम का ज़माने वाला!
दोस्त बनकर भी नहीं साथ निभाने वाला, वही अंदाज़ है ज़ालिम का ज़माने वाला| अहमद फ़राज़
-
शीशे की किरचें!
आज फिर मैं एक वरिष्ठ कवि एवं नवगीतकार श्री बुदधिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| किसी समय मैं हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की झारखंड स्थित मुसाबनी माइंस में हिन्दी अधिकारी था और बुदधिनाथ जी हमारे कलकत्ता स्थित मुख्यालय में हिन्दी विभाग में उच्च पद पर थे, इस प्रकार कई बार उनके सानिध्य…