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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 7th Sep 2022

    गिनती में रह नहीं सकता!

    लगा के देख ले जो भी हिसाब आता हो, मुझे घटा के वो गिनती में रह नहीं सकता| वसीम बरेलवी

  • 7th Sep 2022

    तन्हा तो बह नहीं सकता!

    सहारा लेना ही पड़ता है मुझको दरिया का, मैं एक क़तरा हूँ तन्हा तो बह नहीं सकता| वसीम बरेलवी

  • 7th Sep 2022

    क्या बात कह नहीं सकता!

    ये आज़माने की फ़ुर्सत तुझे कभी मिल जाए, मैं आँखों आँखों में क्या बात कह नहीं सकता| वसीम बरेलवी

  • 7th Sep 2022

    एक ही मंज़र तो रह नहीं सकता!

    किसी के चेहरे को कब तक निगाह में रक्खूँ, सफ़र में एक ही मंज़र तो रह नहीं सकता| वसीम बरेलवी

  • 7th Sep 2022

    ज़मीं से तो कह नहीं सकता!

    मैं आसमाँ पे बहुत देर रह नहीं सकता, मगर ये बात ज़मीं से तो कह नहीं सकता| वसीम बरेलवी

  • 7th Sep 2022

    मुस्कुराने वाले थे!

    भला ग़मों से कहाँ हार जाने वाले थे, हम आँसुओं की तरह मुस्कुराने वाले थे| वसीम बरेलवी

  • 7th Sep 2022

    शब्दों का ठेला!

    स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की एक और कविता आज शेयर कर रहा हूँ| यह कविता, जैसा कि उल्लेख है सर्वेश्वर जी ने अपनी पचासवीं वर्षगाँठ पर लिखी थी और कविता कोश में यह भी उल्लेख है, कि इस कविता को वहाँ श्री दीपक जी ने डाला था| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल…

  • 6th Sep 2022

    जिसे शाम से डर लगता है!

    तेरी क़ुर्बत के ये लम्हे उसे रास आएँ क्या, सुब्ह होने का जिसे शाम से डर लगता है| वसीम बरेलवी

  • 6th Sep 2022

    जगह दी है तो सर लगता है!

    बे-सहारा था बहुत प्यार कोई पूछता क्या, तूने काँधे पे जगह दी है तो सर लगता है| वसीम बरेलवी

  • 6th Sep 2022

    नहाया सा शजर लगता है!

    मैं नज़र भर के तिरे जिस्म को जब देखता हूँ, पहली बारिश में नहाया सा शजर लगता है| वसीम बरेलवी

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