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ख़्वाब देख डालो, इंक़िलाब लाओ!
ये चराग़ जैसे लम्हे कहीं राएगाँ न जाएँ, कोई ख़्वाब देख डालो कोई इंक़िलाब लाओ| राही मासूम रज़ा
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जो अक्सर हमें याद आए हैं!
हाँ उन्हीं लोगों से दुनिया में शिकायत है हमें, हाँ वही लोग जो अक्सर हमें याद आए हैं| राही मासूम रज़ा
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जनता का दुलारा – शैलेन्द्र!
फिल्म संगीत से जुड़ी पोस्ट्स शेयर करने के क्रम में आज पुनः प्रस्तुत है जनकवि शैलेन्द्र जी पर पहले लिखी गई यह पोस्ट| आज ऐसे ही, गीतकार शैलेंद्र जी की याद आ गई। मुझे ये बहुत मुश्किल लगता है कि किसी की जन्मतिथि अथवा पुण्यतिथि का इंतज़ार करूं और तब उसको याद करूं। मैंने कहीं…
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तिरी याद न जाने निकल आए!
एक ख़ौफ़ सा रहता है मिरे दिल में हमेशा, किस घर से तिरी याद न जाने निकल आए| मुनव्वर राना
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बहुत आगे ज़माने निकल आए!
अब तेरे बुलाने से भी हम आ नहीं सकते, हम तुझ से बहुत आगे ज़माने निकल आए| मुनव्वर राना
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भिगोने के बहाने निकल आए!
ऐ रेत के ज़र्रे तिरा एहसान बहुत है, आँखों को भिगोने के बहाने निकल आए| मुनव्वर राना
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हम घर से कमाने निकल आए!
मुमकिन है हमें गाँव भी पहचान न पाए, बचपन में ही हम घर से कमाने निकल आए| मुनव्वर राना
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ख़ज़ाने निकल आए!
माँ बैठ के तकती थी जहाँ से मिरा रस्ता, मिट्टी के हटाते ही ख़ज़ाने निकल आए| मुनव्वर राना
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ख़त उसके पुराने निकल आए!
अलमारी से ख़त उसके पुराने निकल आए, फिर से मिरे चेहरे पे ये दाने निकल आए| मुनव्वर राना