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उन ज़ुल्फ़ों में रात हो गई है!
अब हो मुझे देखिए कहाँ सुब्ह, उन ज़ुल्फ़ों में रात हो गई है| फ़िराक़ गोरखपुरी
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क्यूँ ग़म से नजात हो गई है!
ग़म से छूटकर ये ग़म है मुझको, क्यूँ ग़म से नजात हो गई है| फ़िराक़ गोरखपुरी
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क्या हर्ज़ है!
स्वर्गीय भवानीप्रसाद मिश्र जी को आज फिर उनकी एक लंबी कविता के माध्यम से याद कर रहा हूँ| भवानी दादा हर विषय पर एक अलग अंदाज में अपनी प्रस्तुति देते थे| आज की यह कविता प्रेम संबंधों को लेकर है, भवानी दादा की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय…