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गिला न करेंगे किसी से हम!
लो आज हमने तोड़ दिया रिश्ता-ए-उमीद, लो अब कभी गिला न करेंगे किसी से हम| साहिर लुधियानवी
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पेश आए हैं बेगानगी से हम!
मायूसी-ए-मआल-ए-मोहब्बत न पूछिए, अपनों से पेश आए हैं बेगानगी से हम| साहिर लुधियानवी
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कशमकश-ए-ज़िंदगी से हम!
तंग आ चुके हैं कशमकश-ए-ज़िंदगी से हम, ठुकरा न दें जहाँ को कहीं बे-दिली से हम| साहिर लुधियानवी
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कभी हालात पे रोना आया!
कभी ख़ुद पे कभी हालात पे रोना आया, बात निकली तो हर इक बात पे रोना आया| साहिर लुधियानवी
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हम तो निर्जन के खंडहर हैं!
स्वर्गीय बलबीर सिंह ‘रंग’ जी का एक गीत आज शेयर कर रहा हूँ| एक समय था जब कवि सम्मेलनों में बलबीर सिंह ‘रंग’ जी की अलग ही पहचान हुआ करती थी| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बलबीर सिंह ‘रंग’ जी का यह गीत – हम तो निर्जन के खंडहर हैं।जीवन का साथी सूनापन,उदासीनता का आराधन;प्रिय…
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सब्र में भी हज़रत-ए-अय्यूब रहा हूँ!
फेंक आए थे मुझ को भी मिरे भाई कुएँ में, मैं सब्र में भी हज़रत-ए-अय्यूब रहा हूँ| मुनव्वर राना
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एक जज़ीरे की तरह डूब रहा हूँ!
दुनिया मुझे साहिल से खड़ी देख रही है, मैं एक जज़ीरे की तरह डूब रहा हूँ| मुनव्वर राना
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वो भी ज़माना था कि मैं ख़ूब रहा हूँ!
सच्चाई तो ये है कि तिरे क़र्या-ए-दिल में, इक वो भी ज़माना था कि मैं ख़ूब रहा हूँ| मुनव्वर राना
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इसी शहर का महबूब रहा हूँ!
अब कोई शनासा भी दिखाई नहीं देता, बरसों मैं इसी शहर का महबूब रहा हूँ| मुनव्वर राना
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रौनक़ से मैं अब ऊब रहा हूँ!
दुनिया तिरी रौनक़ से मैं अब ऊब रहा हूँ, तू चाँद मुझे कहती थी मैं डूब रहा हूँ| मुनव्वर राना