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दिन चले न रात चले!
दयार-ए-शाम नहीं मंज़िल-ए-सहर भी नहीं, अजब नगर है यहाँ दिन चले न रात चले| मजरूह सुल्तानपुरी
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जो घर को आग लगाए
जला के मिशअल-ए-जाँ हम जुनूँ-सिफ़ात चले, जो घर को आग लगाए हमारे साथ चले| मजरूह सुल्तानपुरी
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पांच सीढ़ियाँ!
लीजिए आज एक बार फिर से प्रस्तुत है हिन्दी के एक श्रेष्ठ व्यंग्यकार और कुशल मंच संचालक श्री अशोक चक्रधर जी की एक कविता| कविता काफी पुरानी है और इसमें अशोक जी ने अपने प्रिय पात्र ‘बौड़म जी’ के माध्यम से स्वतंत्रता के बाद के पाँच दशकों के बारे में कहा है| चक्रधर जी की…
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फूल कुम्हलाने लगे हैं!
अब तो इस तालाब का पानी बदल दो,ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं| दुष्यंत कुमार
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कहीं चला भी गया!
चलो ‘मुनीर’ चलें अब यहाँ रहें भी तो क्या, वो संग-दिल तो यहाँ से कहीं चला भी गया| मुनीर नियाज़ी
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लहू रुला भी गया!
हवा थी गहरी घटा थी हिना की ख़ुशबू थी, ये एक रात का क़िस्सा लहू रुला भी गया| मुनीर नियाज़ी
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ख़ून आ भी गया!
न आया कोई लब-ए-बाम शाम ढलने लगी, वुफ़ूर-ए-शौक़ से आँखों में ख़ून आ भी गया| मुनीर नियाज़ी
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जल उठी बिजली!
ग़ज़ब हुआ जो अँधेरे में जल उठी बिजली, बदन किसी का तिलिस्मात कुछ दिखा भी गया| मुनीर नियाज़ी