Category: Uncategorized
-
नक़्श उठ आए गुलाब के!
फूलों की सेज पर ज़रा आराम क्या किया, उस गुल-बदन पे नक़्श उठ आए गुलाब के| आदिल मंसूरी
-
क़तील हैं उसी ख़ाना-ख़राब के!
वो जो तुम्हारे हाथ से आकर निकल गया, हम भी क़तील हैं उसी ख़ाना-ख़राब के| आदिल मंसूरी
-
प्यास के क्षण!
आज एक बार मैं वरिष्ठ कवि, गीतकार एवं संपादक श्री बालस्वरूप राही जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| राही जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं, राही जी का काव्य पाठ सुनना भी एक अलग प्रकार का अनुभव रहा है| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बालस्वरूप राही जी का यह…
-
वो काँच का पैकर है!
यूँ देखते रहना उसे अच्छा नहीं ‘मोहसिन’, वो काँच का पैकर है तो पत्थर तिरी आँखें| मोहसिन नक़वी
-
देखेंगी पलट कर तिरी आँखें!
मैं संग-सिफ़त एक ही रस्ते में खड़ा हूँ, शायद मुझे देखेंगी पलट कर तिरी आँखें| मोहसिन नक़वी
-
ताज़ा ग़ज़ल और भी कह लूँ!
मुमकिन हो तो इक ताज़ा ग़ज़ल और भी कह लूँ, फिर ओढ़ न लें ख़्वाब की चादर तिरी आँखें| मोहसिन नक़वी
-
शाम का मंज़र तिरी आँखें!
अब तक मिरी यादों से मिटाए नहीं मिटता, भीगी हुई इक शाम का मंज़र तिरी आँखें| मोहसिन नक़वी
-
दिल में उतर कर तिरी आँखें!
बोझल नज़र आती हैं ब-ज़ाहिर मुझे लेकिन, खुलती हैं बहुत दिल में उतर कर तिरी आँखें| मोहसिन नक़वी
-
लुटाती रहीं गौहर तेरी आँखें!
ख़ाली जो हुई शाम-ए-ग़रीबाँ की हथेली, क्या क्या न लुटाती रहीं गौहर तेरी आँखें| मोहसिन नक़वी
-
मुझसे बिछड़ कर तिरी आँखें!
फिर कौन भला दाद-ए-तबस्सुम उन्हें देगा, रोएँगी बहुत मुझसे बिछड़ कर तिरी आँखें| मोहसिन नक़वी