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आँखों में अफ़्साने थे!
ज़िद्दी वहशी अल्लहड़ चंचल मीठे लोग रसीले लोग, होंट उनके ग़ज़लों के मिसरे आँखों में अफ़्साने थे| इब्न-ए-इंशा
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सब जाने-पहचाने थे!
रात के ख़्वाब सुनाएँ किसको, रात के ख़्वाब सुहाने थे, धुँदले धुँदले चेहरे थे पर सब जाने-पहचाने थे| इब्न-ए-इंशा
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कम है तो मुझे क्या!
मैं सरमद ओ मंसूर बना हूँ तिरी ख़ातिर, ये भी तिरी उम्मीद से कम है तो मुझे क्या| क़तील शिफ़ाई
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सनम है तो मुझे क्या!
पत्थर न पड़ें गर सर-ए-बाज़ार तो कहना, तू मोतरिफ़-ए-हुस्न-ए-सनम है तो मुझे क्या| क़तील शिफ़ाई
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सुक़रात का अंजाम!
भूला तो न होगा तुझे सुक़रात का अंजाम, हाथों में तिरे साग़र-ए-सम है तो मुझे क्या| क़तील शिफ़ाई
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मैंने तो पुकारा है!
मैंने तो पुकारा है मोहब्बत के उफ़क़ से, रस्ते में तिरे संग-ए-हरम है तो मुझे क्या|
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उस दर पे तिरा सर!
जिस दर से नदामत के सिवा कुछ नहीं मिलता, उस दर पे तिरा सर भी जो ख़म है तो मुझे क्या| क़तील शिफ़ाई
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मुझे क़तरा भी मिला हो
हाँ ले ले क़सम गर मुझे क़तरा भी मिला हो, तू शाकी-ए-अर्बाब-ए-करम है तो मुझे क्या| क़तील शिफ़ाई
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चांद हो गए मुंतशिर!
आज फिल्मी गीत और पटकथा लेखक श्री मनोज मुंतशिर के बहाने कुछ बात करने का मन हो रहा है| पिछले दिनों फिल्म ‘आदिपुरुष’ की पटकथा में आए कुछ संवादों के कारण मुंतशिर की काफी बदनामी हुई थी| पिछले एक-दो वर्षों में श्री मुंतशिर ने काफी ख्याति अर्जित की है, इसकी शुरुआत हुई थी फिल्म ‘केसरी’…
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क्या मैंने कहा था कि!
क्या मैंने कहा था कि ज़माने से भला कर, अब तू भी सज़ावार-ए-सितम है तो मुझे क्या| क़तील शिफ़ाई