Category: Uncategorized
-
लफ़्ज़ों में कोई आग छुपा दी जाए!
हमसे पूछो कि ग़ज़ल क्या है ग़ज़ल का फ़न क्या, चंद लफ़्ज़ों में कोई आग छुपा दी जाए| जाँ निसार अख़्तर
-
तेरी जवानी भी मिला दी जाए!
कम नहीं नश्शे में जाड़े की गुलाबी रातें, और अगर तेरी जवानी भी मिला दी जाए| जाँ निसार अख़्तर
-
ज़ख़्मों को दुआ दी जाए!
इन्हीं गुल-रंग दरीचों से सहर झाँकेगी, क्यूँ न खिलते हुए ज़ख़्मों को दुआ दी जाए| जाँ निसार अख़्तर
-
लाश चटानों में दबा दी जाए!
दिल का वो हाल हुआ है ग़म-ए-दौराँ के तले, जैसे इक लाश चटानों में दबा दी जाए| जाँ निसार अख़्तर
-
क़ातिल को दुआ दी जाए!
जब लगें ज़ख़्म तो क़ातिल को दुआ दी जाए, है यही रस्म तो ये रस्म उठा दी जाए| जाँ निसार अख़्तर
-
क्या गाऊँ!
आज फिर हिन्दी कविता के विराट पुरुष- महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ| निराला जी ने इस कविता में भी माता सरस्वती के समक्ष अपना विनम्र निवेदन किया है| निराला जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी…
-
रात सपना बहार का देखा!
रात सपना बहार का देखा दिन हुआ तो ग़ुबार सा देखा,बेवफ़ा वक़्त बेज़ुबाँ निकला बेज़ुबानी को नाम क्या दें हम| सुदर्शन फ़ाकिर
-
इस जवानी को नाम क्या दें हम!
आपको यूँ ही ज़िन्दगी समझा धूप को हमने चाँदनी समझा,भूल ही भूल जिसकी आदत है इस जवानी को नाम क्या दें हम| सुदर्शन फ़ाकिर
-
मेहरबानी को नाम क्या दें हम!
आप इल्ज़ाम धर गये हम पर एक एहसान कर गये हम पर,आपकी ये मेहरबानी है मेहरबानी को नाम क्या दें हम| सुदर्शन फ़ाकिर
-
कहानी को नाम क्या दें हम!
ज़ख़्म जो आप की इनायत है इस निशानी को नाम क्या दें हम,प्यार दीवार बन के रह गया है इस कहानी को नाम क्या दें हम| सुदर्शन फ़ाकिर