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सजाए फिरते थे!
सजाए फिरते थे झूटी अना जो चेहरों पर, वो लोग क़स्र-ए-सिकंदर में जा के लेट गए| मुनव्वर राना
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दर में जा के लेट गए!
तमाम उम्र जो निकले न थे हवेली से, वो एक गुम्बद-ए-बे-दर में जा के लेट गए| मुनव्वर राना
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मौत से डराते हैं!
ये बेवक़ूफ़ उन्हें मौत से डराते हैं, जो ख़ुद ही साया-ए-ख़ंजर में जा के लेट गए| मुनव्वर राना
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न जाने कैसी थकन थी
न जाने कैसी थकन थी कभी नहीं उतरी, चले जो घर से तो दफ़्तर में जा के लेट गए| मुनव्वर राना
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हमारी तिश्ना-नसीबी!
हमारी तिश्ना-नसीबी का हाल मत पूछो, वो प्यास थी कि समुंदर में जा के लेट गए| मुनव्वर राना
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थकन को ओढ़ के!
थकन को ओढ़ के बिस्तर में जा के लेट गए, हम अपनी क़ब्र-ए-मुक़र्रर में जा के लेट गए| मुनव्वर राना
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दुपहरिया!
आज एक बार फिर मैं अज्ञेय जी द्वारा संपादित सप्तकों में से एक प्रमुख कवि की रचना शेयर कर रहा हूँ| स्वर्गीय केदारनाथ सिंह जी का ‘तीसरा सप्तक’ में शामिल एक नवगीत आज प्रस्तुत है| सिंह जी की इस कविता में गर्मी की दुपहरी का प्रभावी चित्रण किया गया है| लीजिए आज प्रस्तुत है…