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जब चली सर्द हवा!
दिल की चोटों ने कभी चैन से रहने न दिया, जब चली सर्द हवा मैंने तुझे याद किया| जोश मलीहाबादी
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निगह-ए-लुत्फ़ ने बर्बाद किया!
वो करें भी तो किन अल्फ़ाज़ में तेरा शिकवा, जिनको तेरी निगह-ए-लुत्फ़ ने बर्बाद किया| जोश मलीहाबादी
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उसने ये इरशाद किया!
सोज़-ए-ग़म दे के मुझे उसने ये इरशाद किया, जा तुझे कशमकश-ए-दहर से आज़ाद किया| जोश मलीहाबादी
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कूद पड़ी हंजूरी कुएँ में!
एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठ रचनाकार स्वर्गीय सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की एक मार्मिक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ| इस कविता में हमारे हृदयहीन सिस्टम का सटीक चित्रण किया गया है| सर्वेश्वर जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की यह कविता…
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अब शम्अ जलाऊँ किसके लिए!
मुद्दत से कोई आया न गया सुनसान पड़ी है घर की फ़ज़ा, इन ख़ाली कमरों में ‘नासिर’ अब शम्अ जलाऊँ किसके लिए| नासिर काज़मी
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गुल-दान सजाऊँ किस के लिए!
अब शहर में उसका बदल ही नहीं कोई वैसा जान-ए-ग़ज़ल ही नहीं, ऐवान-ए-ग़ज़ल में लफ़्ज़ों के गुल-दान सजाऊँ किस के लिए| नासिर काज़मी
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मैं नाज़ उठाऊँ किसके लिए!
वो शहर में था तो उसके लिए औरों से भी मिलना पड़ता था, अब ऐसे-वैसे लोगों के मैं नाज़ उठाऊँ किसके लिए| नासिर काज़मी
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अब ख़ाक उड़ाऊँ किसके लिए!
जिस धूप की दिल में ठंडक थी वो धूप उसी के साथ गई, इन जलती बलती गलियों में अब ख़ाक उड़ाऊँ किसके लिए| नासिर काज़मी
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मैं बाहर जाऊँ किसके लिए!
नए कपड़े बदल कर जाऊँ कहाँ और बाल बनाऊँ किसके लिए, वो शख़्स तो शहर ही छोड़ गया मैं बाहर जाऊँ किसके लिए| नासिर काज़मी