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चुपचाप उल्लास!
आज एक बार मैं हिन्दी के श्रेष्ठ साहित्यकार स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| भवानी दादा की कविताओं में मौन को भी अभिव्यक्त करने का सामर्थ्य है| भवानी दादा की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी…
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शेर तो उन पर लिक्खे!
शेर तो उन पर लिक्खे लेकिन औरों से मंसूब किए, उनको क्या क्या ग़ुस्सा आया नज़्मों के उनवानों पर| जाँ निसार अख़्तर
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जब भी उसके पाँव!
और भी सीना कसने लगता और कमर बल खा जाती, जब भी उसके पाँव फिसलने लगते थे ढलवानों पर| जाँ निसार अख़्तर
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पीतल के गुलदानों पर!
सस्ते दामों ले तो आते लेकिन दिल था भर आया, जाने किस का नाम खुदा था पीतल के गुल-दानों पर| जाँ निसार अख़्तर
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मेरे जलते शानों पर!
शहर के तपते फ़ुटपाथों पर गाँव के मौसम साथ चलें, बूढ़े बरगद हाथ सा रख दें मेरे जलते शानों पर| जाँ निसार अख़्तर
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फेंक गई है धानों पर!
बरखा की तो बात ही छोड़ो चंचल है पुर्वाई भी, जाने किस का सब्ज़ दुपट्टा फेंक गई है धानों पर| जाँ निसार अख़्तर
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पुराना किला!
आज एक बार मैं हिन्दी के श्रेष्ठ साहित्यकार और धर्मयुग पत्रिका यशस्वी संपादक रहे स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की एक लंबी कविता शेयर कर रहा हूँ| इस कविता का रचना काल चीन से युद्ध के बाद का समय है जब नेहरू जी का स्वप्न भंग हो गया था, वे पक्षाघात से पीड़ित थे और राजनीतिज्ञों…
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साड़ी की दूकानों पर!
आज भी जैसे शाने पर तुम हाथ मिरे रख देती हो, चलते चलते रुक जाता हूँ साड़ी की दूकानों पर| जाँ निसार अख़्तर
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घर के रौशनदानों पर!
आए क्या क्या याद नज़र जब पड़ती इन दालानों पर, उसका काग़ज़ चिपका देना घर के रौशन-दानों पर| जाँ निसार अख़्तर