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काम की है नाकामी भी
कितने आशिक़ सँभल गए हैं मेरा फ़साना सुन सुन कर, मेरे हक़ में जैसी भी हो काम की है नाकामी भी| क़ैसर शमीम
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थोड़ी सी बदनामी भी!
थोड़ी सी शोहरत भी मिली है थोड़ी सी बदनामी भी, मेरी सीरत में ऐ ‘क़ैसर’ ख़ूबी भी है ख़ामी भी| क़ैसर शमीम
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समझौता कहाँ हुआ?
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठ कवि और काव्य मंचों पर अपने गीतों के माध्यम से अलग पहचान बनाने वाले स्वर्गीय बलबीर सिंह रंग जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| रंग जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बलबीर सिंह रंग जी…
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अपने ही वतन में रहे!
ज़बाँ हमारी न समझा यहाँ कोई ‘मजरूह’, हम अजनबी की तरह अपने ही वतन में रहे| मजरूह सुल्तानपुरी
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कूज़ा-ए-कुहन में रहे!
ये हुक्म है रहे मुट्ठी में बंद सैल-ए-नसीम, ये ज़िद है बहर-ए-तपाँ कूज़ा-ए-कुहन में रहे| मजरूह सुल्तानपुरी
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बाँकपन में रहे!
हुजूम-ए-दहर में बदली न हम से वज़-ए-ख़िराम, गिरी कुलाह हम अपने ही बाँकपन में रहे| मजरूह सुल्तानपुरी
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तो क्यूँ बदन में रहे!
सरिश्क रंग न बख़्शे तो क्यूँ हो बार-ए-मिज़ा, लहू हिना नहीं बनता तो क्यूँ बदन में रहे| मजरूह सुल्तानपुरी
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चाँदनी की पाँच परतें!
आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ हिन्दी कवि और समाचार पत्रिका ‘दिनमान’ के संपादन से जुड़े रहे स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| सर्वेश्वर जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी का यह नवगीत – चाँदनी…
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शिकन में रहे!
खुले जो हम तो किसी शोख़ की नज़र में खुले, हुए गिरह तो किसी ज़ुल्फ़ की शिकन में रहे| मजरूह सुल्तानपुरी
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हल्क़ा-ए-रसन में रहे
न हम क़फ़स में रुके मिस्ल-ए-बू-ए-गुल सय्याद, न हम मिसाल-ए-सबा हल्क़ा-ए-रसन में रहे| मजरूह सुल्तानपुरी