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चंद उम्मीदें निचोड़ी थीं!
चंद उम्मीदें निचोड़ी थीं तो आहें टपकीं, दिल को पिघलाएँ तो हो सकता है साँसें निकलें| गुलज़ार
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शायद मिरी शाख़ें निकलें!
दफ़्न हो जाएँ कि ज़रख़ेज़ ज़मीं लगती है, कल इसी मिट्टी से शायद मिरी शाख़ें निकलें| गुलज़ार
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चाँद का छलका उतर जाए!
वक़्त की ज़र्ब से कट जाते हैं सब के सीने, चाँद का छलका उतर जाए तो क़ाशें* निकलें| *फांक गुलज़ार
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मिरे लब से दुआएँ निकलें!
ज़िक्र आए तो मिरे लब से दुआएँ निकलें, शम्अ‘ जलती है तो लाज़िम है शुआएँ निकलें| गुलज़ार